
कीर्ति राणा, इंदौर
मुझे लगता है, ‘करवटें बदलते रहे, सारी रात हम’ लिखने वाले गीतकार आनंद बक्षी को गीत का यह मुखड़ा भीषण गर्मी वाले दिनों में, बिना कूलर-एसी और पंखे से गर्म हवा की बारिश सहते हुए ही सूझा होगा।
यह ठीक है कि ‘आप की कसम’ के इस गीत में राजेश खन्ना और मुमताज को मिलन की उम्मीद में विरहाग्नि में तड़पते हुए दिखाया गया है, किंतु यह दर्द आनंद बक्षी का अधिक होगा, जो शायद गर्मी सहन नहीं कर पा रहे होंगे।
उज्जैन में बिना कूलर-एसी के, जब पारा 45 डिग्री से ऊपर खड़ा इतराता हो, तब भरी दोपहर में क्या हालत रहती है, इसे वही समझ सकता है जो रात में न्यूनतम तापमान 28 डिग्री होने पर भी बुखार की तरह तपते गद्दे-चादर पर करवटें बदलते हुए अलसुबह होने का इंतजार करता रहे कि सुबह-सुबह मौसम से जब ठंडक गले लगेगी, तब चुपके से निंदिया रानी भी आ जाएगी।
बढ़ती महंगाई में एक तनख्वाह से दो घर (इंदौर, उज्जैन) का खर्च उठाना यूँ ही चुनौती से कम नहीं। ऐसे में भीषण गर्मी का मुकाबला करने के लिए एसी हेतु 30 हजार या कूलर के इंतजाम के लिए कम से कम 11 हजार रुपये का खर्च—यह सोचकर भुलाना ही बेहतर लगता है कि गर्मी का मौसम एक-डेढ़ महीने का ही तो और बचा है, फिर एकमुश्त इतना खर्च क्यों करें।
तेज गर्मी में दोपहर और रात कैसे गुजरती होगी—यह चिंता तो परिवार के बाकी सदस्य भी फोन पर जाहिर करते रहे, लेकिन विकल्प क्या? ऐसे में ठंडी हवा का झोंका बनकर आया 40 भक्त नगर निवासी भवालकर परिवार, जिनके मकान में रूम खाली होने की जानकारी मुझे इंदौर के मित्र कीर्तिश धामारीकर ने दी थी। इस मकान में किराएदार के रूप में आए हुए बमुश्किल तीन सप्ताह ही हुए हैं।
पेशे से शिक्षिका साक्षी (नम्रता) दीदी ने एक सुबह पूछ लिया, “भाई साब, इतनी गर्मी में आपको परेशानी तो होती होगी?” मैंने हाँ कहने के साथ यह भी जोड़ दिया कि आज ही बाजार में कूलर का भाव पूछा—कम से कम 11 हजार का है।
दीदी ने कहा, “मत लाइए नया। हमारे पास दो कूलर पड़े हैं—एक नागपुरिया है, लोहे का बड़ा वाला और एक छोटा है, प्लास्टिक बॉडी वाला। एसी लगाने के बाद से काम नहीं आ रहे हैं। वैसे छोटे वाले में काम ज्यादा नहीं निकलेगा, फिर भी आप दोनों किसी इलेक्ट्रीशियन को दिखला दीजिए। मेरा स्टूडेंट भी इलेक्ट्रीशियन है, उसे भी बोलती हूँ।”
उन दीदी को तो मेरी परेशानी पर तरस आ गया, लेकिन मेरे और उनके कारीगर ने ‘आज आता हूँ’ करते-करते तीन दिन निकाल दिए। गर्मी के तेज होते जाने का मतलब है. सीजन चलने के कारण सुबह से शाम तक उन दोनों का व्यस्त रहना।
आखिरकार जिस दिन मेरे वाले बिजली बाबू आए, उसी दिन उनका भी स्टूडेंट-इलेक्ट्रीशियन आ गया। उसे तो विदा कर दिया। बिजली बाबू के साथ दूसरी मंजिल पर पहुँचे। संजय (भवालकर) भाई ने गर्मी की मार से कोने में दुबके बैठे दोनों कूलरों को पुचकारा। प्लास्टिक वाले कूलर की जैसे बाँछें खिल गईं कि शायद अब उसके दिन फिरने का मुहूर्त निकला है।
संजय भाई और बिजली बाबू ने बड़े लाड़-प्यार से उसे बाहर निकाला। संजय भाई सलाह दे रहे थे, “देखिए, करंट भी पास हो रहा है या नहीं।” बिजली बाबू ने अपने झोले से औजार निकाले और झाड़-फूँक शुरू कर दी। असर ऐसा हुआ कि कूलर के वॉटर पंप की साँसें चलने लगीं। नब्ज देखकर रोग पहचानने वाले डॉक्टर की तरह बिजली बाबू बोले, “ठीक तो जाएगा, इसे नीचे ले चलते हैं।” जैसे मरीज को परिवार के सदस्य सहारा देकर ले जाते हैं, हम दोनों भी उसे धीरे-धीरे छत से जमीन पर लाए, रूम में ले गए। पंखा फुल स्पीड में चल रहा था। कूलर से ज्यादा हम पसीने-पसीने थे। उसने तो नहीं माँगा, हम जरूर ठंडे पानी से गला तर कर रहे थे।
बिजली बाबू ने उसकी नब्ज टटोली, पंखे की मोटर में गड़बड़ी पकड़ी और जैसे हार्ट स्पेशलिस्ट कहते हैं ‘स्टेंट डालना पड़ेगा’, कुछ इसी अंदाज में कहा, “मोटर के कुछ तार टूट गए हैं, मोटर बदलना पड़ेगी।”
मरीज ऑपरेशन टेबल पर पड़ा हो, जान बचाना जब डॉक्टर के हाथ में हो, तो तीमारदार हर सलाह मान लेता है। बिजली बाबू को सारे अधिकार सौंप दिए थे। वही प्राणरक्षक थे। सारा जरूरी साजोसामान लेकर आए। तब तक श्रीमती जी चाय-पानी की व्यवस्था करती रहीं।
अंततः बिजली बाबू ने मरीज की जान बचा ली। कूलर चल पड़ा, हमारे चेहरे खिल उठे। बिजली बाबू प्राणरक्षक साबित हुए थे। खुशी का एक बड़ा कारण यह भी था कि 11 हजार के कूलर वाला काम 2 हजार में हो गया था। कमरे में कूलर की ठंडी हवा भी कान लगाकर भवालकर परिवार की दयालुता की बातें सुन रही थी।
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