Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
चोर को पकड़ने के बाद भी भूख के डर से जूझता एक गरीब मजदूर शंभू

डर

चोर को पकड़ने वाला साहसी शंभू किसी इंसान से नहीं डरता, लेकिन जब पत्नी उससे उसके सबसे बड़े डर के बारे में पूछती है, तो उसका उत्तर समाज की सबसे कड़वी सच्चाई उजागर कर देता है—भूख।

Read More
कड़ी धूप में काम करती एक भारतीय मजदूर महिला, चेहरे पर थकान और उम्मीद, पीछे पढ़ते बच्चे, दो वक्त की रोटी के संघर्ष का भावुक दृश्य।

रोटी दो जून की

अर्पणा सिंह “अर्पी” , रांची बड़ी मुश्किलों से मिल पाती है निजात,मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात। बैशाख की दोपहरी की धूप या बहती लू,पसीने से लथपथ हो या हो तपती भू।तन ढकने को वसन और मिटाने को भूख,इसी की आपूर्ति में रहते हैं हर पल मशगूल। बड़ी मुश्किलों से मिल पाती…

Read More
सूर्योदय के समय निर्माण स्थल पर खड़ा एक भारतीय श्रमिक, चेहरे पर थकान और गर्व के भाव, मेहनत और संघर्ष का प्रेरक दृश्य।

हाँ, मैं श्रमिक हूँ

“हाँ मैं श्रमिक हूँ” एक प्रेरक और संवेदनशील हिंदी कविता है, जो मजदूर वर्ग के संघर्ष, परिश्रम और त्याग को उजागर करती है। कविता बताती है कि श्रमिक अपने परिवार से दूर रहकर कठिन मेहनत करता है, लेकिन फिर भी अपने काम में गर्व महसूस करता है। छुट्टियाँ, आराम और उत्सव उसके जीवन में कम होते हैं, फिर भी वह समाज की रफ्तार चलाता है। यह कविता मेहनतकश लोगों के जीवन की सच्चाई को सरल शब्दों में सामने लाती है और श्रमिकों के प्रति सम्मान जगाती है।

Read More