प्रेम, ख़ामोशी, रहस्य और सामाजिक सरोकारों के बीच अपनी अलग साहित्यिक पहचान गढ़ती लेखिका और कवयित्री किश्वर अंजुम से एक आत्मीय बातचीत

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
शब्दों से दोस्ती कभी-कभी कब साहित्यिक यात्रा में बदल जाती है, इसका एहसास स्वयं लेखक को भी देर से होता है. किश्वर अंजुम की रचनात्मक यात्रा भी कुछ ऐसी ही है. छठी कक्षा में लिखी पहली कविता से शुरू होकर कविता, कहानी, सामाजिक-राजनीतिक आलेख, रहस्य-कथाओं और साझा साहित्यिक संकलनों तक पहुँचती हुई.
अध्यापन, आकाशवाणी में कार्यक्रम प्रस्तुति, दूरदर्शन में एंकरिंग और नरेशन जैसे विविध अनुभवों ने उनकी अभिव्यक्ति को कई आयाम दिए. उनके लेखन में प्रेम केवल प्रेम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मनुष्य, रिश्तों, समाज और उन अनकही संवेदनाओं तक फैल जाता है, जिन्हें अक्सर शब्द नहीं मिल पाते.
प्रतीक्षा में प्रेम से ख़ामोशी के उतरे पैरहन तक की यात्रा उनके भीतर की संवेदना के विस्तार की कहानी है, तो परछाइयाँ अंधेरों की उनके रचनात्मक संसार के एक अलग और रहस्यमय पक्ष से परिचय कराती है. वास्तविक अनुभवों से उपजी उनकी मिस्ट्री कहानियाँ साहित्य और जीवन के बीच की उस महीन रेखा को छूती हैं, जहाँ सच और कल्पना एक-दूसरे में घुलने लगते हैं.
इस बातचीत में किश्वर अंजुम ने अपनी भाषा, लेखन की प्रक्रिया, स्त्री की ख़ामोशी, सामाजिक सरोकारों और आने वाली रचनात्मक योजनाओं पर खुलकर बात की है. उनकी बातों में एक लेखक की बेचैनी भी है और अपने अगले काम को पिछले काम से बेहतर करने का आत्मविश्वास भी. यह बातें उन्होंने लाइव वॉयर न्यूज से बातचीत में साझा की. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के मुख्य अंश-
प्रश्न- आपकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कहाँ से हुई? छात्र जीवन में वाद-विवाद और निबंध प्रतियोगिताओं में सक्रियता से लेकर आज एक लेखिका और कवयित्री के रूप में आपकी यात्रा किन पड़ावों से होकर गुज़री?
उत्तर: मेरी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत शायद उस समय हो गई थी, जब मुझे खुद भी इसका एहसास नहीं था. छात्र जीवन में वाद-विवाद और निबंध प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना मुझे बहुत पसंद था. अपने विचारों को शब्द देना और फिर उन्हें लोगों के सामने रखना अच्छा लगता था. धीरे-धीरे वही शब्दों से दोस्ती लेखन में बदलती चली गई.
मेरी पहली कविता मैंने छठी कक्षा में लिखी थी. भावनाओं को कहने के लिए कविता मुझे सबसे सहज माध्यम लगी. फिर सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लिखना शुरू किया, कहानियाँ लिखीं और समय के साथ अलग-अलग विधाओं में हाथ आज़माती गई. इस बीच अध्यापन, आकाशवाणी में कार्यक्रम प्रस्तुति, दूरदर्शन में एंकरिंग और नरेशन जैसे अनुभव भी जीवन का हिस्सा बने. इन सबने मेरी अभिव्यक्ति को अलग-अलग तरह से समृद्ध किया.
मैंने कभी यह सोचकर नहीं लिखा कि मुझे लेखिका बनना है. लिखना मेरे लिए पहले अभिव्यक्ति था, फिर धीरे-धीरे वही मेरी पहचान बनता गया. और आज भी मैं अपने आपको किसी एक मुकाम पर पहुँचा हुआ नहीं मानती. मुझे लगता है, यात्रा अभी जारी है.

प्रश्न-आपने अपनी अभिव्यक्ति के लिए हिंदी को प्राथमिकता दी, जबकि आपकी रचनाओं में उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द भी आवश्यकता के अनुसार दिखाई देते हैं. भाषा को लेकर आपकी अपनी साहित्यिक दृष्टि क्या है?
उत्तर: हिंदी मेरी अभिव्यक्ति की भाषा है और मेरी पहली पसंद भी. मैं हिंदी में सोचती हूँ, इसलिए लिखते समय स्वाभाविक रूप से हिंदी ही आती है. लेकिन भाषा मेरे लिए कोई बंद कमरा नहीं है कि उसमें दूसरे शब्दों का प्रवेश निषिद्ध हो.
हमारी हिंदी सदियों से दूसरी भाषाओं से शब्द लेती और उन्हें अपना बनाती आई है. उर्दू के कई शब्द हमारी रोज़मर्रा की भाषा में इतने रचे-बसे हैं कि उन्हें अलग करके देखना ही मुश्किल है. और जहाँ कोई अंग्रेज़ी शब्द भाव को अधिक सहजता से व्यक्त करता है और वह बोलचाल में भी स्वाभाविक है, वहाँ उसके प्रयोग से मुझे कोई परहेज़ नहीं. मेरे लिए भाषा की सबसे बड़ी कसौटी उसकी सहजता और भाव की सच्चाई है. मैं शब्दकोश देखकर शब्द नहीं चुनती, भाव देखकर चुनती हूँ. जो शब्द मेरे भाव को पाठक तक सबसे ठीक तरह पहुँचा दे, वही मेरे लिए सही शब्द है.
प्रश्न-प्रतीक्षा में प्रेम से लेकर ख़ामोशी के उतरे पैरहन तक आपकी रचनात्मक यात्रा में प्रेम, संवेदना और जीवन के बदलते रंग दिखाई देते हैं. इन दोनों शीर्षकों के बीच आप अपने लेखन में कितना बदलाव महसूस करती हैं?
उत्तर: बहुत बदलाव महसूस करती हूँ. शायद हर लेखक के साथ ऐसा होता है कि जैसे-जैसे जीवन उसे अनुभव देता जाता है, उसकी दृष्टि भी बदलती जाती है. प्रतीक्षा में प्रेम के समय भावनाओं का केंद्र प्रेम और उससे जुड़ी अनुभूतियाँ थीं. वह मेरा पहला साझा संकलन था. लेकिन धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि प्रेम केवल किसी एक रिश्ते का नाम नहीं है. उसमें मनुष्य के प्रति संवेदना, रिश्तों की जिम्मेदारी, समाज के प्रति सरोकार और दूसरों के दुख को महसूस करना भी शामिल है. ख़ामोशी के उतरे पैरहन तक आते-आते मेरी दृष्टि शायद अधिक गहरी हुई है. अब मैं केवल यह नहीं देखती कि कोई व्यक्ति क्या कह रहा है, बल्कि यह भी देखने की कोशिश करती हूँ कि वह क्या नहीं कह पा रहा.
मेरे लेखन में बदलाव आया है, लेकिन मेरी मूल संवेदना वही है. शायद बस उसका दायरा बढ़ गया है.
प्रश्न-आपकी पुस्तक परछाइयाँ अंधेरों की एकल मिस्ट्री कहानियों का संग्रह है. कविता और सामाजिक-राजनैतिक लेखों से अलग रहस्य-कथा लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली और इस विधा में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?
उत्तर: मुझे रहस्य और मिस्ट्री हमेशा आकर्षित करते रहे हैं, लेकिन ङ्गपरछाइयाँ अंधेरों कीफ को मैं केवल कल्पना से उपजी कहानियों का संग्रह नहीं कहूँगी. मेरी इन रचनाओं के पीछे सच्चे अनुभव हैं, कुछ मेरे अपने और कुछ विश्वसनीय व्यक्तियों से सुने हुए अनुभव.
हाँ, कहानी का रूप देते समय रचनात्मकता और कल्पना का सहारा लेना पड़ता है. पात्रों, घटनाओं और कथानक को साहित्यिक रूप देना होता है, लेकिन उसकी मूल संवेदना या घटना का बीज वास्तविक अनुभवों से आया है. शायद यही वजह है कि इन कहानियों में मुझे एक अलग तरह की विश्वसनीयता महसूस होती है.
रहस्य-कथा लिखने की सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि वास्तविक अनुभव को कहानी बनाते हुए उसकी रोचकता भी बनी रहे और उसे सनसनीखेज़ बनाने के चक्कर में उसकी सच्चाई न खोए, वह नाटकीय न लगे.
कविता में मैं भाव के साथ चल सकती हूँ, लेकिन मिस्ट्री में मुझे पाठक की जिज्ञासा का भी ध्यान रखना पड़ता है. वहाँ हर संकेत, हर घटना और हर पात्र का अपना महत्व होता है. और सच कहूँ तो, पाठक को अंत तक अपने साथ लेकर चलना और फिर उसे रहस्य का एक ऐसा सिरा देना, जिससे वह पीछे की पूरी कहानी को नए ढंग से देखने लगे, यह चुनौती मुझे बहुत रोचक लगती है.

प्रश्न-बात अभी बाक़ी है चार लेखकों का कहानी-संग्रह है, जबकि आपकी कई रचनाएँ साझा संकलनों का हिस्सा रही हैं. सामूहिक साहित्यिक प्रयास और एकल पुस्तक इन दोनों अनुभवों में आपको क्या अंतर महसूस हुआ?
उत्तर: साझा संकलनों का अपना आनंद है. अलग-अलग रचनाकारों की सोच, भाषा और संवेदना एक ही पुस्तक में साथ आती है. वहाँ एक तरह का रचनात्मक संवाद होता है. बात अभी बाक़ी है जैसे सामूहिक प्रयास में चार अलग-अलग लेखकीय दृष्टियाँ एक साथ आईं. ऐसे काम में सहयोग और सामंजस्य की अपनी खूबसूरती होती है. वहीं एकल पुस्तक में लेखक के पास अपनी पूरी रचनात्मक दुनिया को अपने ढंग से रखने की स्वतंत्रता होती है, लेकिन उसके साथ पूरी जिम्मेदारी भी होती है. मुझे दोनों अनुभव अच्छे लगते हैं. साझा संकलन मुझे विविधता देते हैं और एकल पुस्तक मुझे अपने भीतर की दुनिया को अधिक विस्तार से सामने रखने का अवसर देती है. और शायद बात अभी बाक़ी है का शीर्षक भी मेरे लिए बहुत उपयुक्त है, क्योंकि लेखक के पास सचमुच हमेशा कुछ न कुछ बाक़ी रहता है.
प्रश्न-आपने समाचारपत्रों में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर आलेख लिखे हैं. साहित्यिक संवेदना और सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के बीच संतुलन बनाते समय एक लेखक की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए?
उत्तर: मेरे लिए लेखक समाज से बाहर खड़ा हुआ कोई व्यक्ति नहीं है. वह उसी समाज में रहता है, उसी समय को देखता और भोगता है. इसलिए उसके लेखन में अपने समय की हलचल का आना स्वाभाविक है.
लेकिन सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लिखते समय लेखक की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. मेरी कोशिश रहती है कि किसी विषय पर लिखते हुए भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय तथ्य और मानवीय संवेदना दोनों को साथ रखा जाए. लेखक का काम केवल अपनी राय सुना देना नहीं है. वह पाठक को सोचने का अवसर भी दे. मैं किसी पर अपना निष्कर्ष थोपने के बजाय सवाल उठाना अधिक महत्वपूर्ण मानती हूँ. मेरे लिए लेखन की सबसे बड़ी ईमानदारी यही है कि जो लिखूँ, उसके प्रति स्वयं भी ईमानदार रहूँ, चाहे विषय साहित्य का हो, समाज का हो या राजनीति का.
प्रश्न-आकाशवाणी में कार्यक्रम प्रस्तुति, दूरदर्शन छत्तीसगढ़ में एंकरिंग और यूट्यूब चैनलों पर नरेशन ने आपके लेखन को किस तरह प्रभावित किया? क्या बोलकर शब्दों को प्रस्तुत करना और काग़ज़ पर लिखना आपके लिए दो अलग रचनात्मक अनुभव हैं?
उत्तर: हाँ, दोनों अलग अनुभव हैं, लेकिन एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं. काग़ज़ पर लिखे शब्द को पाठक अपनी गति और अपने भाव से पढ़ता है. लेकिन जब वही शब्द आवाज़ के माध्यम से सामने आते हैं, तो उच्चारण, ठहराव, आवाज़ का उतार-चढ़ाव और लय भी उसका हिस्सा बन जाते हैं. आकाशवाणी और दूरदर्शन में संक्षिप्त संलग्नता ने मुझे अवश्य ही शब्दों को साधने की कला सिखाई. कई बार लिखते हुए भी मैं वाक्य को मन ही मन बोलकर देखती हूँ कि उसमें प्रवाह है या नहीं. और नरेशन ने तो यह और गहरा किया कि शब्द केवल सुंदर होना पर्याप्त नहीं है, उसे सुनने वाले तक सही भाव के साथ पहुँचना भी चाहिए.
इसलिए मैं कहूँगी कि लिखना और बोलना मेरे लिए दो अलग माध्यम हैं, लेकिन दोनों ने मेरी अभिव्यक्ति को एक-दूसरे से बहुत कुछ दिया है.
प्रश्न-आपने लंबे समय तक अध्यापन कार्य भी किया. शिक्षक के रूप में बच्चों और युवा पीढ़ी के साथ आपके अनुभवों ने आपकी लेखनी और समाज को देखने के आपके नज़रिए को किस तरह प्रभावित किया?
उत्तर: अध्यापन ने मुझे बहुत कुछ दिया है. शायद जितना मैंने बच्चों को पढ़ाया, उससे कहीं अधिक मैंने उनसे सीखा. बच्चे और युवा बहुत सहजता से सवाल करते हैं. उनके सवालों में कोई बनावट नहीं होती. उनके सपने, उनकी जिज्ञासाएँ, उनकी परेशानियाँ और उनके बदलते हुए विचार समाज की बदलती तस्वीर भी दिखाते हैं. एक शिक्षक के रूप में मैंने यह महसूस किया कि हर बच्चे के भीतर एक अलग कहानी होती है. उसे केवल पढ़ाने के बजाय उसे समझना भी ज़रूरी है.

शायद इसी वजह से मेरे लेखन में मनुष्य और उसकी भावनाएँ हमेशा केंद्र में रही हैं. अध्यापन ने मुझे लोगों को केवल उनके व्यवहार से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे कारणों से समझने की कोशिश करना सिखाया.
प्रश्न-आपकी पुस्तक ख़ामोशी के उतरे पैरहन का शीर्षक अपने आप में बेहद संवेदनशील और प्रतीकात्मक है. इस शीर्षक के पीछे कौन-सा भाव या अनुभव है, और आज की स्त्री की ख़ामोशी को आप किस रूप में देखती हैं?
उत्तर: ख़ामोशी के उतरे पैरहन मेरे लिए एक बहुत भीतर का शीर्षक है. कई बार इंसान बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन कह नहीं पाता. परिस्थितियाँ, रिश्ते, सामाजिक अपेक्षाएँ या भीतर की कोई गाँठ उसके शब्दों को रोक देती है.
और स्त्री की ख़ामोशी को तो मैंने बहुत अलग-अलग रूपों में देखा है. हर ख़ामोशी कमजोरी नहीं होती. कभी वह सहनशीलता होती है, कभी रिश्ते बचाने की कोशिश, कभी परिस्थितियों से समझौता और कभी ऐसा दर्द, जिसके लिए शब्द ही नहीं मिलते. लेकिन मैं यह भी मानती हूँ कि ख़ामोशी को स्त्री की नियति नहीं होना चाहिए. आज की स्त्री पहले से कहीं अधिक मुखर है. वह प्रश्न करती है, अपने अधिकारों को समझती है और अपनी बात कहने का साहस रखती है.
मेरे लिए लेखन उन्हीं ख़ामोशियों को शब्द देने की एक कोशिश है. उन बातों को सामने लाने की, जो कही नहीं गईं, लेकिन महसूस बहुत गहराई से की गईं.
प्रश्न-आज की किश्वर अंजुम के भीतर अभी क्या बाक़ी है? आने वाले समय में पाठकों को आपकी ओर से किस तरह का लेखन, कौन-सी नई पुस्तक या कोई ऐसा विषय देखने को मिल सकता है, जिसे आप लंबे समय से लिखना चाहती हैं लेकिन अभी तक शब्द नहीं दे पाई हैं?
उत्तर: मेरे भीतर अभी बहुत कुछ बाक़ी है. सच कहूँ तो अगर किसी लेखक को लगने लगे कि कहने को अब कुछ नहीं बचा, तो शायद उसके लिखने की वजह ही खत्म हो जाए. मेरे भीतर कविता अभी भी उतनी ही जीवित है. कहानियाँ भी हैं, सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषय भी हैं और कुछ ऐसे अनुभव भी हैं, जिन्हें अभी शब्द देने बाकी हैं. मैं किसी एक विधा में अपने आपको बाँधकर नहीं रखना चाहती. जिस विषय की जो माँग होगी, वह उसी रूप में आएगा. कविता होगी तो कविता, कहानी होगी तो कहानी और विचार माँगेगा तो आलेख.
कुछ विषय ऐसे हैं, जिन्हें मैं लंबे समय से अपने भीतर लेकर चल रही हूँ. शायद उनका समय अभी नहीं आया. मेरा विश्वास है कि हर रचना का अपना एक समय होता है. जब भीतर का अनुभव और बाहर के शब्द एक-दूसरे से मिलते हैं, तभी वह रचना जन्म लेती है. अभी एक साथ तीन-चार प्रोजेक्ट चल रहे हैं, लेकिन मैं जल्दी में नहीं हूँ. ख़ुद से मुकाबला है कि अगला काम पिछले काम से बहुत बेहतर हो.
और अगर आज की किश्वर अंजुम से पूछा जाए कि उसके भीतर क्या बाक़ी है, तो मेरा जवाब होगा बहुत कुछ.
क्योंकि मेरी कहानी अभी पूरी कहाँ हुई है!
बात अभी बाक़ी है.
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हार्दिक धन्यवाद सुरेश जी🌹🌹
साक्षात्कार के द्वारा आपको ज्यादा जान सकी ।
एक सही और विशिष्ट साक्षात्कार