खतों की याद पर खूबसूरत हिंदी कविता

विजया डालमिया, हैदराबाद
खतों का भी क्या जमाना था,
उनसे बात करने का बस यही तो एक बहाना था।
खत… एक खूबसूरत एहसास।
शब्दों के माध्यम से किसी के दिल को छू लेना, यह जादूगरी बड़े कमाल की होती थी। जुबान जहाँ आकर रुक जाए, वहीं से खत की रस्म-अदायगी की शुरुआत बड़ी खामोशी से होती थी।
शब्द आपस में बात कर रहे होते थे। खत पढ़ते वक्त सामने वाले की तस्वीर आँखों में और खयाल दिल में उभर आते थे। कुछ बातें होठों पर मुस्कान ले आतीं, तो कुछ आँखों में आँसू ले आतीं।
दूर बैठे इंसान को अपनी मौजूदगी का एहसास कराने की कला को ही तो खत कहते हैं।
सालों बाद भी जब खत हाथ में आते हैं, तो दिल कह उठता है
“खतों में बसी खुशबू कहाँ जाती है,
जब भी छूती हूँ उन्हें,
तेरी महक याद बनकर छू जाती है।”
इसी संदर्भ में मेरी एक कविता प्रस्तुत है
चलो, आज हम एक-दूसरे को फिर से खत लिखते हैं।
मेरे शब्द बन जाएँ हवा,
तुम बन जाओ खनक।
संवादों को माध्यम बना,
एक-दूसरे को महसूस करते हैं।
चलो, आज हम एक-दूसरे को फिर से खत लिखते हैं।
वह कागज पर चलती कलम तुम्हारी
और कलम पर स्पर्श तुम्हारा।
हर अल्फाज पर टिकी
तुम्हारी नजर को हम सलाम करते हैं।
चलो, आज हम एक-दूसरे को फिर से खत लिखते हैं।
“मौसम कैसा है?
आम के पेड़ों में कितने आम आए हैं?”
ऐसी मामूली बातों से
बदलते मौसम को तलाश करते हैं।
चलो, आज हम एक-दूसरे को फिर से खत लिखते हैं।
छोटी-छोटी शिकायतों के
छोटे-छोटे सवाल कर,
शब्दों की बड़ी-सी श्रृंखला तैयार करते हैं।
चलो, आज हम एक-दूसरे को फिर से खत लिखते हैं।
लिफाफे पर लिखा
अपना नाम पढ़कर,
अंदर ‘प्रिय’ का संबोधन देखकर
और अंत में तुम्हारा नाम पढ़कर,
उस खत को चूमते हैं।
चलो, आज हम एक-दूसरे को फिर से खत लिखते हैं।
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