साहित्य, स्त्री-संवेदना और मिथिला की सांस्कृतिक विरासत पर प्रसिद्ध लेखिका सुप्रसन्ना से लाइव वॉयर न्यूज की बेबाक बातचीत

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
कुछ यात्राएँ केवल स्थान नहीं बदलतीं, वे मनुष्य के भीतर की दुनिया को भी विस्तार देती हैं. बिहार के वनगाँव की मिट्टी से शुरू होकर जोधपुर तक पहुँची सुप्रसन्ना की साहित्यिक यात्रा ऐसी ही यात्रा है, जिसमें भूगोल बदला, परिवेश बदला, लेकिन संस्कारों और स्मृतियों की वह मूल धारा बनी रही, जिसने उनके रचनाकार व्यक्तित्व को आकार दिया. मिथिला की लोक-संस्कृति, परिवार की आत्मीयता, लोकगीतों की लय, प्रकृति का निकट सान्निध्य और जीवन के छोटे-छोटे अनुभव उनकी रचनात्मक चेतना की आधारभूमि बने. हिन्दी और मैथिली दोनों भाषाओं में लेखन करते हुए उन्होंने कविता, कथा, लघुकथा, अनुवाद और संपादन जैसी विविध विधाओं में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज की है. उनकी रचनाओं में स्त्री-मन की संवेदनाएँ हैं तो मानवीय संबंधों की ऊष्मा भी; लोकजीवन की सुगंध है तो बदलते समय और समाज को लेकर सजग दृष्टि भी.
उनकी एकल काव्य-कृति ‘अवनि से अम्बर तक’ उनके इसी व्यापक रचनात्मक संसार का महत्वपूर्ण पड़ाव है. धरती से आकाश तक की यह यात्रा उनके लिए केवल बाहरी उपलब्धियों की यात्रा नहीं, बल्कि संघर्ष, प्रेम, विश्वास, आशा और आत्मबोध से गुजरती हुई भीतर की यात्रा भी है. सुप्रसन्ना के लिए साहित्य लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम भर नहीं, बल्कि संवेदना और संवाद की जिम्मेदारी है. वे मानती हैं कि सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले हैं, लेकिन स्थायी साहित्यिक पहचान के लिए अध्ययन, चिंतन, भाषा-साधना और मौलिकता आवश्यक हैं. इसी रचनात्मक यात्रा, मिथिला की सांस्कृतिक स्मृतियों, स्त्री-संवेदना, साहित्य की बदलती दुनिया और ‘अवनि से अम्बर तक’ के अनुभवों पर सुप्रसन्ना से हुई बातचीत के मुख्य अंश-
प्रश्न : बिहार के वनगाँव से जोधपुर तक का आपका सफर केवल भौगोलिक यात्रा नहीं, बल्कि संस्कारों और सृजन की यात्रा भी रहा है. बचपन के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश ने सुप्रसन्ना रचनाकार को किस तरह गढ़ा?

उत्तर : मायके की मिट्टी, वनगाँव का लोकजीवन, पारिवारिक संस्कार और मिथिला की सांस्कृतिक चेतना मेरे व्यक्तित्व की आधारभूमि रहे हैं. घर में शिक्षा, साहित्य और संगीत का वातावरण था. लोकगीत, पर्व-त्योहार, पारिवारिक संवाद और प्रकृति के निकट जीवन ने बचपन से ही संवेदनशील दृष्टि प्रदान की. जोधपुर आने के बाद भौगोलिक परिवेश बदला, लेकिन भीतर की मिट्टी वही रही. मेरी रचनाओं में यदि मानवीय संबंधों की ऊष्मा, लोक-संस्कृति की सुगंध और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि दिखाई देती है, तो उसका श्रेय मेरे प्रारम्भिक संस्कारों को ही है.
प्रश्न : आपने हिन्दी और मैथिली दोनों भाषाओं में सृजन किया है. जब कोई भाव आपके भीतर जन्म लेता है, तो वह पहले किस भाषा में दस्तक देता है और आप कैसे तय करती हैं कि उसे हिन्दी में लिखना है या मैथिली में?
उत्तर-यह भाव की प्रकृति पर निर्भर करता है. जो अनुभूतियाँ मेरे लोक, परिवार, स्मृतियों और मिट्टी से जुड़ी होती हैं, वे प्रायः मैथिली में सहज रूप से आकार लेती हैं. मैथिली मेरे भावलोक की आत्मीय भाषा है. वहीं व्यापक सामाजिक सरोकारों या ऐसे विषयों पर, जिन्हें अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाना ध्येय रहा,मेरे लिए भाषा अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि संवेदना है.
.प्रश्न : आपकी रचनाओं में मिथिला की संस्कृति, लोकजीवन, पारिवारिक संबंध और स्त्री-मन दिखाई देता है. आधुनिक समय में मिथिला की कौन-सी सांस्कृतिक विरासत आपको सबसे अधिक चिंतित या आकर्षित करती है?
उत्तर -मिथिला की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध है. मुझे सबसे अधिक आकर्षित उसकी लोकपरंपराएँ, पारिवारिक मूल्य, लोकगीत और सामुदायिक जीवन की आत्मीयता करती है. वहीं चिंता इस बात की है कि आधुनिकता और व्यस्त जीवनशैली के कारण नई पीढ़ी अपनी भाषायी और सांस्कृतिक जड़ों से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है. मेरा मानना है कि परंपरा और आधुनिकता विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं, यदि हम अपनी सांस्कृतिक पहचान को सहेजते हुए आगे बढ़ें.
प्रश्न : आपने अध्यापन और साहित्य-सृजन को भी साधा. इन अलग-अलग कलाओं ने आपकी लेखनी को किस तरह प्रभावित किया? क्या आपकी कविता में आपको संगीत की लय भी सुनाई देती है?
उत्तर -निस्संदेह. अध्यापन ने मुझे समाज और मनुष्य को निकट से समझने की दृष्टि दी, संगीत ने संवेदनाओं को स्वर दिया . कविता में शब्दों का चयन ही पर्याप्त नहीं होता, उसमें एक आंतरिक लय भी होती है.

प्रश्न- आपकी एकल काव्य-कृति ‘अवनि से अम्बर तक’ आपके रचनात्मक संसार का महत्वपूर्ण पड़ाव है. इस संग्रह के पीछे वह कौन-सा अनुभव, भाव या जीवन-दृष्टि थी, जिसने आपको अवनि से अम्बर तक की यात्रा लिखने के लिए प्रेरित किया?
उत्तर-अवनि से अम्बर तक मेरे जीवनानुभवों, संवेदनाओं और मानवीय रिश्तों की यात्रा है. यह संग्रह केवल व्यक्तिगत अनुभवों का दस्तावेज नहीं, बल्कि धरती से आकाश तक फैले जीवन के विविध रंगों को समझने का प्रयास है. संघर्ष, आशा, प्रेम, विश्वास और आत्मबोध की अनेक अनुभूतियाँ इस कृति की प्रेरणा बनीं. मैं मानती हूँ कि मनुष्य का विकास बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक यात्रा से होता है; यही दृष्टि इस संग्रह का मूल भाव है.
प्रश्न : आपने कविता के साथ कथा, लघुकथा, अनुवाद और संपादन में भी काम किया है. इन विधाओं में से कौन-सी विधा आपको अपने सबसे करीब लगती है और क्यों?
उत्तर-यद्यपि सभी विधाओं में कार्य करने का अवसर मिला है, फिर भी कविता मेरे सबसे निकट है. कविता कम शब्दों में गहन अनुभूति व्यक्त करने की क्षमता रखती है. कई बार जो बात लंबी कथा में कही जाती है, वही कविता की कुछ पंक्तियों में अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त हो जाती है.
प्रश्न : एक स्त्री रचनाकार के रूप में क्या आपको कभी यह महसूस हुआ कि समाज स्त्री की संवेदनाओं और उसकी रचनात्मक स्वतंत्रता को पुरुष रचनाकार से अलग नजरिए से देखता है? आपकी लेखनी ने इस अनुभव का सामना कैसे किया?
उत्तर –समाज में दृष्टिकोण बदल रहे हैं, फिर भी कुछ पूर्वाग्रह आज भी मौजूद हैं. कई बार स्त्री की अभिव्यक्ति को उसके साहित्यिक मूल्य से अधिक उसके स्त्री होने के संदर्भ में देखा जाता है. किंतु मेरा विश्वास है कि सशक्त लेखन अंततः अपनी पहचान स्वयं बना लेता है. मैंने किसी प्रतिरोध की मुद्रा में नहीं, बल्कि अपने अनुभवों और विचारों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करके इस स्थिति का सामना किया है. साहित्य मेरे लिए संवाद और संवेदना का माध्यम है, संघर्ष का घोषणापत्र नहीं.
प्रश्न : आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को लेखक और कवि बनने का अवसर दिया है, लेकिन साहित्य में स्थायी पहचान बनाना अब भी कठिन है. आपके अनुसार आज के नवोदित रचनाकार को ङ्गलोकप्रियताफ और ङ्गसाहित्यिक गुणवत्ताफ के बीच किस तरह संतुलन बनाना चाहिए?
उत्तर– सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का लोकतांत्रिक मंच है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए. किंतु त्वरित लोकप्रियता को साहित्यिक उपलब्धि मान लेना उचित नहीं है. नवोदित रचनाकारों को निरंतर अध्ययन, चिंतन और भाषा-साधना पर ध्यान देना चाहिए. लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, लेकिन साहित्यिक गुणवत्ता दीर्घकालिक पहचान बनाती है. मेरा मानना है कि यदि रचना में ईमानदारी, संवेदना और शिल्प का संतुलन है, तो लोकप्रियता भी सार्थक रूप में प्राप्त होती है.

प्रश्न : आपने साझा संकलनों के संपादन और प्रकाशन के माध्यम से अनेक रचनाकारों को मंच दिया है. संपादक की भूमिका निभाते समय किसी रचना में आप सबसे पहले क्या खोजती हैं भाषा, भाव, मौलिकता, विचार या लेखक की अपनी आवाज़?
उत्तर-ये सभी तत्व महत्वपूर्ण हैं, किंतु सबसे पहले मैं रचना की मौलिकता और लेखक की अपनी विशिष्ट आवाज़ को खोजती हूँ. भाषा और शिल्प समय के साथ परिष्कृत हो सकते हैं, लेकिन मौलिक दृष्टि और प्रामाणिक संवेदना अर्जित करना कठिन होता है. एक संपादक के रूप में मेरा प्रयास रहता है कि रचना में विचार की स्पष्टता, भाव की सच्चाई और अभिव्यक्ति की गरिमा बनी रहे.
प्रश्न : यदि सुप्रसन्ना को अपनी अब तक की साहित्यिक यात्रा को पीछे मुड़कर देखते हुए एक प्रश्न स्वयं से पूछना हो, तो वह प्रश्न क्या होगा? और आज की सुप्रसन्ना उस प्रश्न का क्या उत्तर देगी?
उत्तर :-मैं स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहूँगी
क्या मेरी लेखनी ने मनुष्य और समाज के प्रति अपनी संवेदनशीलता को ईमानदारी से निभाया है?
आज की सुप्रसन्ना का उत्तर होगा मैंने अपनी सामर्थ्य भर जीवन, समाज, संबंधों और मानवीय मूल्यों को शब्द देने का प्रयास किया है. अभी बहुत कुछ सीखना और लिखना शेष है, किंतु यह संतोष अवश्य है कि मेरी लेखनी ने संवेदना, संवाद और सकारात्मकता का साथ नहीं छोड़ा.
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प्रभावी अभिव्यक्ति, अच्छा लगा आपको और जानकर सुप्रसन्ना जी
बहुत, बहुत धन्यवाद सुरेश परिहार जी
बहुत, बहुत धन्यवाद सुरेश जी