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डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ : शब्दों से जीवन संवारने वाली

बारिश भरी शाम में बरामदे में साथ बैठे एक युवा भारतीय प्रेमी युगल का भावुक दृश्य. महिला पुरुष के कंधे पर सिर रखे हुए है, दोनों के हाथ एक-दूसरे में थामे हुए हैं. पास में चाय के कप रखे हैं, कमरे में दीपक की मद्धम रोशनी फैली है और बाहर हल्की बारिश हो रही है. दोनों के चेहरों पर प्रेम, विश्वास और गहरे अपनत्व की शांत अभिव्यक्ति दिखाई दे रही है.

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

कुछ लोग किताबें लिखते हैं और कुछ लोग ज़िंदगी को ही एक किताब की तरह जीते हैं। डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ उन्हीं लोगों में से एक हैं। जब उनसे बात होती है तो महसूस होता है कि उनके लिए साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं है। यह लोगों के दुख-दर्द को समझने, उनकी भावनाओं को आवाज़ देने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम है। एक ओर वे शिक्षिका बनकर बच्चों का भविष्य संवारती हैं, तो दूसरी ओर साहित्यकार बनकर अपनी लेखनी से संवेदनाओं की मशाल जलाए रखती हैं। और फिर है राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच एक ऐसा मंच, जिसे वे अपनी संतान की तरह स्नेह और समर्पण से सींच रही हैं। प्रस्तुत है शिक्षिका, साहित्यकार और राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच की संस्थापिका डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ से एक विशेष बातचीत, जिसमें उन्होंने अपने साहित्यिक सफर, संघर्षों, सपनों और नई पीढ़ी के लिए अपने संदेश को बेहद सहज और आत्मीय अंदाज़ में साझा किया।

सवाल- आप एक शिक्षिका, साहित्यकार और राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच की संस्थापिका हैं. इन तीनों भूमिकाओं में आपको सबसे अधिक संतुष्टि किस कार्य से मिलती है और क्यों?

जवाब-मेरे लिए ये तीनों भूमिकाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं. शिक्षिका के रूप में विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण में योगदान देना, साहित्यकार के रूप में अपनी संवेदनाओं और विचारों को समाज तक पहुँचाना तथा राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच के माध्यम से साहित्यकारों को एक सशक्त मंच प्रदान करनाये तीनों ही मुझे आत्मिक संतोष देते हैं. यह मंच मेरी संतान के समान है.
यदि एक भूमिका चुननी हो, तो साहित्य सेवा और नवोदित रचनाकारों को आगे बढ़ाने का कार्य मुझे सबसे अधिक संतुष्टि देता है, क्योंकि इससे अनेक प्रतिभाओं को पहचान और प्रोत्साहन मिलता है.

सवाल- आपकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कब और कैसे हुई? लेखन की प्रेरणा आपको किन व्यक्तियों, परिस्थितियों या अनुभवों से मिली?

जवाब-
मेरी साहित्यिक यात्रा बचपन से ही आरम्भ हो गई थी. विद्यालयी दिनों से ही कविता और लेख लिखने में मेरी रुचि थी. जीवन के विविध अनुभवों, सामाजिक परिवेश और मानवीय संवेदनाओं ने मेरी लेखनी को दिशा दी. परिवार का प्रोत्साहन, शिक्षकों का मार्गदर्शन और साहित्य के प्रति गहरी रुचि ने मुझे निरंतर लिखने के लिए प्रेरित किया. समाज में घटित घटनाएँ और लोगों के संघर्ष मेरे लेखन के प्रमुख प्रेरणा-स्रोत रहे हैं.

सवाल- आपकी एकल पुस्तक मेरी भावनाएँ पाठकों के बीच चर्चित रही है. इस पुस्तक की रचना-प्रक्रिया और इसके पीछे की भावनात्मक प्रेरणा के बारे में बताइए.

जवाब-
मेरी भावनाएँ मेरे मन की अनुभूतियों, जीवन के अनुभवों और समाज के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है. इस पुस्तक की रचना किसी एक समय में नहीं हुई, बल्कि वर्षों तक संचित भावनाओं ने शब्दों का रूप लिया.
इसमें प्रेम, करुणा, संघर्ष, आशा और जीवन-दर्शन से जुड़े अनेक भाव समाहित हैं. पाठकों द्वारा इसे अपनाया जाना मेरे लिए अत्यंत सुखद और प्रेरणादायक रहा है.

सवाल- राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच की स्थापना का विचार आपके मन में कैसे आया? इस मंच के माध्यम से आप साहित्य और समाज में किस प्रकार का परिवर्तन लाना चाहती हैं?

जवाब-
साहित्य के क्षेत्र में कार्य करते हुए मैंने देखा कि अनेक प्रतिभाशाली रचनाकारों को उचित मंच और पहचान नहीं मिल पाती. इसी विचार ने राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच की स्थापना की प्रेरणा दी.
मेरा उद्देश्य साहित्यकारों को एक सशक्त मंच प्रदान करना, हिन्दी साहित्य का प्रचार-प्रसार करना तथा साहित्य के माध्यम से सामाजिक जागरूकता और सकारात्मक परिवर्तन को बढ़ावा देना है.

सवाल- आपकी रचनाएँ देश-विदेश के अनेक समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. एक रचनाकार के रूप में पाठकों की प्रतिक्रियाएँ आपके लेखन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?

जवाब-
पाठकों की प्रतिक्रियाएँ किसी भी रचनाकार के लिए ऊर्जा का स्रोत होती हैं. जब पाठक मेरी रचनाओं से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं, तो मुझे यह विश्वास मिलता है कि मेरी लेखनी सही दिशा में है.
उनकी सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मुझे और बेहतर लिखने की प्रेरणा देती हैं, वहीं रचनात्मक सुझाव आत्ममंथन और सुधार का अवसर प्रदान करते हैं.

सवाल- एफ.एम. रेडियो पर काव्य-पाठ का अनुभव कैसा रहा? मंचीय प्रस्तुति और लिखित अभिव्यक्ति में आप क्या अंतर महसूस करती हैं?

जवाब-एफ.एम. रेडियो पर काव्य-पाठ का अनुभव अत्यंत यादगार और रोमांचक रहा. जब अपनी रचना को स्वर देकर श्रोताओं तक पहुँचाया जाता है, तो शब्दों की प्रभावशीलता और भी बढ़ जाती है.
लिखित अभिव्यक्ति में पाठक अपनी कल्पना के माध्यम से भावों को ग्रहण करता है, जबकि मंचीय प्रस्तुति में कवि अपनी आवाज़, भाव-भंगिमा और प्रस्तुति शैली से सीधे श्रोताओं के हृदय तक पहुँचता है.

सवाल- आपको वाचस्पति मानद उपाधि, कलम रत्न पुरस्कार, साहित्य संगिनी पुरस्कार, अजातशत्रु पुरस्कार और साहित्य प्रभा पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया है. इनमें से कौन-सा सम्मान आपके लिए सबसे अधिक भावनात्मक महत्व रखता है और क्यों?

जवाब-
प्रत्येक सम्मान मेरे लिए विशेष है, क्योंकि वह मेरी साहित्य साधना और परिश्रम की स्वीकृति का प्रतीक है. हालांकि वाचस्पति मानद उपाधि मेरे लिए विशेष भावनात्मक महत्व रखती है, क्योंकि यह केवल सम्मान नहीं, बल्कि साहित्य के प्रति मेरी निष्ठा और समर्पण की पहचान है.यह सम्मान मुझे निरंतर बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देता है.

सवाल- आज के डिजिटल युग में साहित्य का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों को आप साहित्य के लिए अवसर मानती हैं या चुनौती?

जवाब-
मैं इन्हें अवसर और चुनौती दोनों मानती हूँ.अवसर इसलिए कि आज साहित्य वैश्विक स्तर पर तेजी से पाठकों तक पहुँच रहा है और नए रचनाकारों को मंच मिल रहा है. वहीं, चुनौती इसलिए कि त्वरित प्रसिद्धि की चाह में कभी-कभी गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है. आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक का उपयोग साहित्य की गरिमा और गुणवत्ता को बनाए रखते हुए किया जाए.

सवाल- एक महिला साहित्यकार के रूप में आपने किन संघर्षों और चुनौतियों का सामना किया? उन अनुभवों ने आपके व्यक्तित्व और लेखन को किस प्रकार समृद्ध किया?

जवाब-
एक महिला साहित्यकार होने के नाते पारिवारिक दायित्वों और साहित्यिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण रहा. कई बार सामाजिक पूर्वाग्रहों और सीमित अवसरों का भी सामना करना पड़ा.
लेकिन इन संघर्षों ने मुझे अधिक मजबूत, संवेदनशील और आत्मविश्वासी बनाया. मेरे अनुभवों ने मेरे लेखन को गहराई दी और मुझे समाज की वास्तविकताओं को अधिक निकटता से समझने का अवसर प्रदान किया.

सवाल- नवोदित रचनाकारों, विशेषकर युवा पीढ़ी और महिला लेखिकाओं के लिए आपका क्या संदेश है, जो साहित्य के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं?

जवाब-
मेरा संदेश है कि साहित्य-साधना धैर्य, अनुशासन और निरंतर अभ्यास की मांग करती है. अधिक पढ़ें, नियमित लिखें और आलोचना को सीखने के अवसर के रूप में स्वीकार करें. अपनी मौलिकता को बनाए रखें और किसी की नकल करने के बजाय अपनी विशिष्ट पहचान विकसित करें. विशेष रूप से महिला लेखिकाओं से मैं कहना चाहूँगी कि वे आत्मविश्वास के साथ अपनी प्रतिभा को सामने लाएँ, क्योंकि उनकी संवेदनाएँ और दृष्टिकोण समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं.

2 thoughts on “डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ : शब्दों से जीवन संवारने वाली

  1. अनामिका जी, आपसे मुलाकात हुई थी, पर आपकी पहचान से मुलाकात आज हुई। अच्छा लगा ।

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