एक-दूजे में समाने की वह रात

बारिश भरी शाम में बरामदे में साथ बैठे एक युवा भारतीय प्रेमी युगल का भावुक दृश्य. महिला पुरुष के कंधे पर सिर रखे हुए है, दोनों के हाथ एक-दूसरे में थामे हुए हैं.
बारिश भरी शाम में बरामदे में साथ बैठे एक युवा भारतीय प्रेमी युगल का भावुक दृश्य. महिला पुरुष के कंधे पर सिर रखे हुए है, दोनों के हाथ एक-दूसरे में थामे हुए हैं. पास में चाय के कप रखे हैं, कमरे में दीपक की मद्धम रोशनी फैली है और बाहर हल्की बारिश हो रही है. दोनों के चेहरों पर प्रेम, विश्वास और गहरे अपनत्व की शांत अभिव्यक्ति दिखाई दे रही है.

सुरेश परिहार, पुणे

सांझ धीरे-धीरे उतर रही थी. खिड़की के बाहर हल्की बारिश हो रही थी और कमरे में चाय की महक फैली हुई थी. राघव और रिद्धिमा बरामदे में बैठे थे. दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही थी, फिर भी बहुत कुछ कहा जा चुका था.

रिद्धिमा ने धीरे से अपना सिर राघव के कंधे पर रख दिया.

“जानते हो,” उसने धीमे स्वर में कहा, “कुछ लोग ज़िंदगी में आते हैं और फिर ऐसे बस जाते हैं कि उनके बिना अपनी धड़कन भी अधूरी लगती है.”

राघव मुस्कुराया. उसने उसकी उँगलियों को अपने हाथ में थाम लिया.

“और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके सामने शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती. बस उनकी मौजूदगी ही घर जैसी लगती है.”

रिद्धिमा ने उसकी ओर देखा. उसकी आँखों में बरसों का अपनापन था. उन आँखों में प्रेम था, विश्वास था और वह निश्चिंतता भी, जो केवल सच्चे रिश्तों में मिलती है.

अचानक हवा का एक झोंका आया. रिद्धिमा के बाल उसके चेहरे पर बिखर गए. राघव को रिद्धिमा हमेशा खुले बालों में ही अच्छी लगती थी. वह कभी बाल बाँध भी लेती, तो राघव उन्हें खोलने के लिए कहता था. शायद राघव को रिद्धिमा के खुले बालों की खुशबू बहुत पसंद थी. राघव ने बहुत स्नेह से उसकी लटों को पीछे किया. उस स्पर्श में कोई अधीरता नहीं थी, केवल अपनापन था.

रिद्धिमा ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया.

“राघव…”

“हूँ?”

“अगर कभी मैं खो जाऊँ, तो मुझे ढूँढ़ लोगे?”

राघव ने उसके माथे को चूमते हुए कहा, “तुम कहीं खो ही नहीं सकती, रिद्धिमा. तुम तो मेरे भीतर रहती हो.”

यह सुनकर उसकी आँखें भीग गईं.

वह धीरे-धीरे उसके और करीब आ गई. राघव ने उसे अपने आलिंगन में भर लिया. वह आलिंगन किसी शरीर का नहीं, दो आत्माओं का मिलन था. जैसे वर्षों से भटकी हुई दो नदियाँ अंततः एक ही सागर में आ मिली हों.

कुछ क्षण दोनों वैसे ही खड़े रहे. रिद्धिमा को राघव जब भी पीछे से आकर पकड़ता, तो वह एकदम दूसरी ही दुनिया में चली जाती थी.

रिद्धिमा ने आँखें बंद कर लीं. उसे लगा, जैसे उसकी सारी थकान, सारे भय और सारी उदासियाँ उस आलिंगन में पिघल रही हैं. राघव के सीने से लगी हुई वह स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही थी.

राघव ने भी उसे और कसकर थाम लिया. उसे लगा, जैसे उसके जीवन के सारे अधूरे गीत आज शब्द पा गए हों.

उस रात बारिश देर तक होती रही.

कमरे में दीपक की मद्धम रोशनी थी. दोनों एक-दूसरे के सामने बैठे थे. उनकी आँखों में प्रेम का वह शांत समुद्र था, जिसमें कोई लहर शोर नहीं करती, बस गहराई बढ़ती जाती है.

रिद्धिमा ने अपना हाथ राघव के गाल पर रख दिया.

“तुम्हें पता है,” उसने मुस्कुराकर कहा, “मैंने प्रेम को हमेशा किसी कविता की तरह सोचा था.”

“…और अब?” राघव ने पूछा.

“अब लगता है, प्रेम कविता नहीं, घर होता है.”

राघव ने उसे अपने पास खींच लिया.

उनके बीच की दूरियाँ मिटती चली गईं. दो धड़कनें एक लय में धड़कने लगीं. उनके प्रेम ने उस रात एक नया रूप लिया—विश्वास का, समर्पण का, एक-दूसरे में पूरी तरह समा जाने का.

वे एक-दूसरे के इतने करीब थे कि शब्द अनावश्यक हो गए थे. वहाँ केवल स्पर्श की ऊष्मा थी, साँसों की धीमी लय थी और दो प्रेम करने वाले हृदय थे, जो बिना किसी शोर के एक-दूसरे को अपना संपूर्ण संसार सौंप रहे थे.

उस मिलन में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, कोई वासना नहीं थी, केवल प्रेम था. ऐसा प्रेम, जिसमें दो लोग एक-दूसरे को पाने से अधिक, एक-दूसरे में खो जाना चाहते हैं.

बाहर बारिश थम चुकी थी. अंदर दोनों का तूफ़ान भी.

राघव को आज ज़िंदगी का सबसे बड़ा उपहार मिल गया था, जो रिद्धिमा ने उसे दिया था.

वह रात इसी तरह गुज़र गई और आकाश में बादलों के बीच से चाँद निकल आया था.

उस चाँदनी में राघव और रिद्धिमा एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे थे. दो अलग-अलग व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ही कहानी के दो सुंदर अध्याय, जो प्रेम की स्याही से हमेशा के लिए एक-दूसरे में लिखे जा चुके थे.

One thought on “एक-दूजे में समाने की वह रात

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *