
किरण अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
युद्ध ज़रूरी है,
युद्ध टाला भी नहीं जा सकता।
युद्ध से डर भी लगता है,
और युद्ध विनाशकारी भी होता है।
युद्ध के परिणाम से डरकर उसे टालते रहना,
कई बार युद्ध को और घना बना देता है।
पल-पल राख होने से अच्छा,
एक ही बार में राख होना!
अन्याय पूर्णतः रुकता तो नहीं,
पर कुछ हद तक अन्याय के अंत के लिए
युद्ध भी ज़रूरी हो जाता है।
वैसे युद्ध कोई चाहता नहीं,
फिर भी इंसान के कर्म ऐसे होते जाते हैं कि
दूसरी तरफ के सब्र का अंत होने लगता है
और युद्ध अनिवार्य हो जाता है।
मौन युद्ध करते-करते
जब लोग थक जाते हैं,
तो वास्तविक युद्ध होना
लगभग निश्चित हो जाता है।
जब लोग युद्ध में उतरते हैं,
तो उन्हें पता होता है कि
वे भी शायद नहीं बचेंगे,
सृष्टि युगांतर तक उसके परिणाम भोगेगी,
फिर भी युद्ध होता रहा है।
जिन्होंने कभी युद्ध न करने की ठानी,
उन्हें भी युद्ध करना पड़ा।
जो युद्ध को बुरा मानते थे,
उन्हें भी हथियार उठाने पड़े।
युद्ध के वीभत्स परिणामों को देखकर भी
युद्ध किए गए।
दोषी और निर्दोष दोनों मारे गए।
रामायण और महाभारत,
दोनों इसकी गवाह हैं।
युद्ध से पहले
युद्ध को न समझ पाना ही
अक्सर युद्ध करवाता रहा है।
अतः युद्ध को समझना ज़रूरी है।
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