एक बेटे की नज़र से पिता को समझने की भावुक कहानी

सुधांशु द्विवेदी, बांदा (उत्तर प्रदेश)
पिता लिखे नहीं जाते, पिता पढ़े नहीं जाते,
पिता गढ़े जाते हैं।
इस सवाल से महरूम करके कि ज़िम्मेदारियों के इस सफर में
कभी तो वे भी थके होंगे।
उनके यह कहने में कि, “मैं सब संभाल लूँगा,”
कभी तो यह भाव भी आया होगा कि, “अगर नहीं संभाल पाया तो?”
मैंने पिता को कभी रोते नहीं देखा।
लेकिन जब दादी गुज़रीं और दीदी की शादी के बाद उनकी विदाई हुई, तब मैंने उन्हें लगभग चीखकर रोते हुए देखा।
मैं हैरान था कि जिस शख्स को मैंने मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी हँसते देखा, आज वह रो रहा है।
मुझे अपने हैरान होने पर हैरान होना चाहिए, क्योंकि मैं कभी समझ ही नहीं पाया कि पिता होने से पहले वे एक पुरुष हैं, एक इंसान हैं।
मैं उन्हें हमेशा सिर्फ पिता के तौर पर ही देख पाया।
शायद इसीलिए मैं उन्हें लिख रहा हूँ।
जिस दिन मैं उन्हें पिता से इतर देख पाऊँगा,
उस दिन उन्हें लिख पाने से ज़्यादा, उन्हें समझ पाने का दावा कर पाऊँगा।
एक अंतराल है
पिता और मुझमें,
लिखे जाने और समझे जाने का।

अच्छी अभिव्यक्ति 💐