
सपना चन्द्रा ,कहलगांव, भागलपुर (बिहार)
उन औरतों को पढ़ना कितना ज़रूरी है
जिन्होंने आधी किवाड़ खोलकर
बाहर देखना चाहा था।
बाहर और भीतर की दुनिया से
तालमेल बिठाती वे औरतें
अब कहाँ गुम हो गई हैं?
क्या अब भी वे हममें कहीं हैं?
किवाड़ की ओट से झाँकती हुई-सी,
ज़रा-सी ताज़ी हवा को
पाने की ख़्वाहिश रखती हुई,
वेदना की मीठी चुभन से भी
अत्यंत प्रसन्नचित्त होती,
वह मासूम-सी मुस्कुराहट
पल भर के लिए ही सही,
मगर होंठों पर खिलती थी।

बहुत अच्छी कविता 👌