गुम औरतें

आधी खुली किवाड़ से बाहर झाँकती एक चिंतनशील भारतीय स्त्री, स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की आकांक्षा का प्रतीक।

सपना चन्द्रा ,कहलगांव, भागलपुर (बिहार)

उन औरतों को पढ़ना कितना ज़रूरी है
जिन्होंने आधी किवाड़ खोलकर
बाहर देखना चाहा था।
बाहर और भीतर की दुनिया से
तालमेल बिठाती वे औरतें
अब कहाँ गुम हो गई हैं?
क्या अब भी वे हममें कहीं हैं?

किवाड़ की ओट से झाँकती हुई-सी,
ज़रा-सी ताज़ी हवा को
पाने की ख़्वाहिश रखती हुई,
वेदना की मीठी चुभन से भी
अत्यंत प्रसन्नचित्त होती,
वह मासूम-सी मुस्कुराहट
पल भर के लिए ही सही,
मगर होंठों पर खिलती थी।
इन रचनाओं को भी पढ़ें-और अपनी राय अवश्य दें,

मैं हूँ धुआँ…
पिता लिखे नहीं जाते
पिता की पीड़ा
योग करो, स्वस्थ रहो
सीता चाहिए, तो राम भी बनो
जीवन के इस मेले में
किरदार
गुम औरतें

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