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स्त्री के आत्मसम्मान और अधिकारों को दर्शाती हिंदी कविता

स्त्री होने का अभिमान

स्त्री के अस्तित्व, सम्मान, अधिकार और आत्मबोध को केंद्र में रखती यह कविता बदलते समाज में स्त्री के अपने मान और स्त्रीत्व को पहचानने की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.

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अच्छी औरत: समाज की सोच, घरेलू हिंसा और एक स्त्री की अनकही कहानी

अच्छी औरत

एक नई दुल्हन, जो कभी घूँघट में सिमटी रहती थी, घरेलू हिंसा, अपमान और जीवन की क्रूर परिस्थितियों से गुजरते-गुजरते ऐसी दुनिया में पहुँच जाती है जहाँ समाज उसे “अच्छी औरत” मानने से इनकार कर देता है। यह मार्मिक कविता केवल एक स्त्री की कहानी नहीं, बल्कि उन सामाजिक मानदंडों पर सवाल है जो परिस्थितियों को नहीं, केवल परिणामों को देखते हैं।

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हाँ, मौन हूँ मैं कहानी

हाँ, मौन हूँ मैं

कभी-कभी स्त्री इसलिए मौन नहीं होती कि उसके पास कहने को कुछ नहीं होता, बल्कि इसलिए कि उसके शब्दों को सुनने वाला कोई नहीं होता। ‘हाँ, मौन हूँ मैं’ एक ऐसी लेखिका की कहानी है, जिसने अपने प्रेम और रिश्ते को बचाने के लिए अपने सपनों को चुप करा दिया, लेकिन अंततः उसका मौन समझा गया और उसके शब्दों ने फिर जन्म लिया।

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आईने के सामने खड़ी एक भारतीय महिला, जो परिवार की जिम्मेदारियों के बीच स्वयं की पहचान और आत्ममंथन में खोई हुई दिखाई दे रही है।

स्त्री : एक मुलाकात

‘स्त्री – एक मुलाकात’ एक मार्मिक कविता है, जो उस स्त्री की कहानी कहती है जो परिवार, बच्चों और जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते स्वयं से दूर हो जाती है। यह कविता स्त्री के त्याग, उसकी अनदेखी इच्छाओं और अपनी पहचान से पुनः मिलने की आकांक्षा को संवेदनशीलता से व्यक्त करती है।

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आधी खुली किवाड़ से बाहर झाँकती एक चिंतनशील भारतीय स्त्री, स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की आकांक्षा का प्रतीक।

गुम औरतें

आधी खुली किवाड़ों से बाहर झाँकती वे स्त्रियाँ, जिन्होंने सीमाओं के भीतर रहकर भी खुले आकाश का सपना देखा था। समय के साथ वे कहीं गुम-सी हो गईं, लेकिन उनकी इच्छाएँ, मुस्कानें और स्वतंत्रता की आकांक्षा आज भी हमारे भीतर जीवित हैं।

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विवाह के प्रतीकात्मक वातावरण में एक भारतीय माँ अपनी बेटी का हाथ थामे खड़ी है, जो आत्मसम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र पहचान का संदेश देती है।

मेरी बेटियों

“मेरी बेटियों” केवल विवाह पर लिखी कविता नहीं, बल्कि बेटियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र पहचान और रिश्तों में गरिमा की बात करने वाली संवेदनशील अभिव्यक्ति है। यह कविता कन्यादान, सामाजिक अपेक्षाओं और समझौते की सीमाओं पर प्रश्न उठाते हुए बेटियों को यह संदेश देती है कि किसी भी रिश्ते से पहले उनका जीवन और सम्मान महत्वपूर्ण है।

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एक भारतीय बेटी आत्मविश्वास के साथ खड़ी है, जो “पराया धन” जैसी सामाजिक सोच से परे स्वतंत्र पहचान और आत्मसम्मान का प्रतीक है।

बेटियाँ पराया धन नहीं

“पराया धन” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि वह सामाजिक सोच है जो बेटियों को अपने ही घर में अस्थायी महसूस कराती है। यह लेख स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्मसम्मान और भावनात्मक सबलता की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाता है और समाज से आग्रह करता है कि बेटियों को संपत्ति नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह देखना सीखे।

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नए घर में अकेली बैठी एक भारतीय नवविवाहिता, चेहरे पर चिंता और भावनात्मक संघर्ष का भाव, घरेलू परिवेश की पृष्ठभूमि।

बहू भी इंसान है

शादी केवल नए रिश्तों की शुरुआत नहीं, बल्कि एक स्त्री के लिए नए संघर्षों की भी शुरुआत हो सकती है। यह लेख बहू के भावनात्मक संघर्ष, अपेक्षाओं और ससुराल व्यवस्था पर जरूरी सवाल उठाता है।

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“बाजोट कहानी संग्रह की थीम दर्शाता भारतीय पारिवारिक और सामाजिक दृश्य”

“बाजोट”: रिश्तों के आईने में झांकता सच

“बाजोट” कहानी संग्रह आधुनिक भारतीय समाज, रिश्तों की जटिलताओं और मनुष्य के आंतरिक द्वंद्व का सजीव चित्रण है। यह समीक्षा पुस्तक की हर कहानी के गहरे अर्थ और सामाजिक संदर्भ को उजागर करती है।

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“स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।

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