मुंबई में आयोजित महिला सशक्तीकरण पर साहित्यिक कार्यक्रम का दृश्य

स्त्री : परम्परा और प्रगति की देहरी पर

मुंबई में ‘स्त्री : परम्परा और प्रगति की देहरी पर’ विषय पर आयोजित एक विशेष साहित्यिक कार्यक्रम में स्त्री जीवन के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श किया गया। ‘बतरस : एक अनौपचारिक उपक्रम’ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता विभा रानी ने स्त्री-पुरुष असमानता, सामाजिक रूढ़ियों और आधुनिक चुनौतियों पर अपने विचार रखे।

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स्त्री जीवन और संघर्ष को दर्शाती कविता “हम सपने देख रहे हैं”

हम सपने देख रहे हैं….

“हम सपने देख रहे हैं” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो स्त्री के जीवन, त्याग, श्रम, घरेलू और सामाजिक संघर्ष को रोटी के प्रतीक के माध्यम से गहराई से अभिव्यक्त करती है।

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स्वतंत्र और आत्मविश्वासी भारतीय महिला नारी अधिकार और समानता का प्रतीक बनकर खड़ी

मैं नारी हूँ जागीर नहीं

यह कविता नारी की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अधिकारों की बुलंद आवाज़ है। समाज में स्त्री को जागीर समझने की मानसिकता पर तीखा प्रहार करती यह रचना समानता और सम्मान की माँग करती है।

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संघर्ष और दृढ़ संकल्प से निखरती स्त्री को दर्शाती यथार्थवादी तस्वीर

सबसे खूबसूरत स्त्री

सबसे खूबसूरत स्त्री” एक सशक्त कविता है जो स्त्री के सौंदर्य को संघर्ष, दृढ़ संकल्प और अदम्य जिजीविषा के रूप में परिभाषित करती है। यह कविता स्त्री की मौन शक्ति और आत्मबल को स्वर देती है।

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नारी देह, प्रकृति और समाज की दोहरी नैतिकता

यह सशक्त वैचारिक निबंध नारी, देह और समाज की दोहरी मानसिकता पर तीखा प्रश्न उठाता है। गाँव और शहर की स्त्रियों के दृष्टिकोण, सेक्स को लेकर समाज की संकीर्णता और प्रकृति के सहज संतुलन को केंद्र में रखते हुए लेख स्त्री-विमर्श को एक गहरे दार्शनिक स्तर पर ले जाता है।

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महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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Softly lit close-up of two Indian hands gently reaching toward each other without touching, expressing emotional connection, trust, and respectful intimacy in a calm, warm-toned setting.

स्पर्श : संवेदना का संगीत

कुछ स्पर्श शरीर को नहीं, मन को छूते हैं। वे न वासना जगाते हैं, न भय बस भीतर कहीं भरोसे की लौ जला देते हैं। मर्यादा में बंधे ऐसे स्पर्श रिश्तों को शब्दों से पहले समझा देते हैं और इंसान को इंसान होने का एहसास कराते हैं।

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फुसफुसाहटों का ज़हर

जब शब्द हथियार बन जाएँ और फुसफुसाहटों में ज़हर घुलने लगे, तब एक स्त्री का सच बोलना केवल आत्मरक्षा नहीं रहता, वह समाज को आईना दिखाने का साहस बन जाता है। अपनी कहानी कहकर वह न सिर्फ़ स्वयं को मुक्त करती है, बल्कि उन अनकही चुप्पियों को भी तोड़ देती है, जिनमें अपराध पनपते हैं।

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चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

स्त्री के उस अनकहे इतिहास की साक्षी है, जिसे वह नीले निशानों, झुकी आँखों और मौन सहमति के बीच ढोती रहती है। पिता से पति तक, देह से धर्म तक, वह हर भूमिका निभाती हुई अपनी इच्छाओं को अवर्जित कर देती है। अहिल्या, द्रौपदी, उर्मिला और सीता की तरह वह सदियों से अग्नि-परीक्षाओं में झोंकी जाती है फिर भी सृजन करती है, सहती है और अंत तक एक अभेद रहस्य बनी रहती है

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कितनी अमायरा!

अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।

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