स्त्री होने का अभिमान
स्त्री के अस्तित्व, सम्मान, अधिकार और आत्मबोध को केंद्र में रखती यह कविता बदलते समाज में स्त्री के अपने मान और स्त्रीत्व को पहचानने की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.

स्त्री के अस्तित्व, सम्मान, अधिकार और आत्मबोध को केंद्र में रखती यह कविता बदलते समाज में स्त्री के अपने मान और स्त्रीत्व को पहचानने की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.
एक नई दुल्हन, जो कभी घूँघट में सिमटी रहती थी, घरेलू हिंसा, अपमान और जीवन की क्रूर परिस्थितियों से गुजरते-गुजरते ऐसी दुनिया में पहुँच जाती है जहाँ समाज उसे “अच्छी औरत” मानने से इनकार कर देता है। यह मार्मिक कविता केवल एक स्त्री की कहानी नहीं, बल्कि उन सामाजिक मानदंडों पर सवाल है जो परिस्थितियों को नहीं, केवल परिणामों को देखते हैं।
कभी-कभी स्त्री इसलिए मौन नहीं होती कि उसके पास कहने को कुछ नहीं होता, बल्कि इसलिए कि उसके शब्दों को सुनने वाला कोई नहीं होता। ‘हाँ, मौन हूँ मैं’ एक ऐसी लेखिका की कहानी है, जिसने अपने प्रेम और रिश्ते को बचाने के लिए अपने सपनों को चुप करा दिया, लेकिन अंततः उसका मौन समझा गया और उसके शब्दों ने फिर जन्म लिया।
‘स्त्री – एक मुलाकात’ एक मार्मिक कविता है, जो उस स्त्री की कहानी कहती है जो परिवार, बच्चों और जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते स्वयं से दूर हो जाती है। यह कविता स्त्री के त्याग, उसकी अनदेखी इच्छाओं और अपनी पहचान से पुनः मिलने की आकांक्षा को संवेदनशीलता से व्यक्त करती है।
“मेरी बेटियों” केवल विवाह पर लिखी कविता नहीं, बल्कि बेटियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र पहचान और रिश्तों में गरिमा की बात करने वाली संवेदनशील अभिव्यक्ति है। यह कविता कन्यादान, सामाजिक अपेक्षाओं और समझौते की सीमाओं पर प्रश्न उठाते हुए बेटियों को यह संदेश देती है कि किसी भी रिश्ते से पहले उनका जीवन और सम्मान महत्वपूर्ण है।
“पराया धन” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि वह सामाजिक सोच है जो बेटियों को अपने ही घर में अस्थायी महसूस कराती है। यह लेख स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्मसम्मान और भावनात्मक सबलता की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाता है और समाज से आग्रह करता है कि बेटियों को संपत्ति नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह देखना सीखे।
शादी केवल नए रिश्तों की शुरुआत नहीं, बल्कि एक स्त्री के लिए नए संघर्षों की भी शुरुआत हो सकती है। यह लेख बहू के भावनात्मक संघर्ष, अपेक्षाओं और ससुराल व्यवस्था पर जरूरी सवाल उठाता है।
“बाजोट” कहानी संग्रह आधुनिक भारतीय समाज, रिश्तों की जटिलताओं और मनुष्य के आंतरिक द्वंद्व का सजीव चित्रण है। यह समीक्षा पुस्तक की हर कहानी के गहरे अर्थ और सामाजिक संदर्भ को उजागर करती है।
साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।