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फुसफुसाहटों का ज़हर

जब शब्द हथियार बन जाएँ और फुसफुसाहटों में ज़हर घुलने लगे, तब एक स्त्री का सच बोलना केवल आत्मरक्षा नहीं रहता, वह समाज को आईना दिखाने का साहस बन जाता है। अपनी कहानी कहकर वह न सिर्फ़ स्वयं को मुक्त करती है, बल्कि उन अनकही चुप्पियों को भी तोड़ देती है, जिनमें अपराध पनपते हैं।

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चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

स्त्री के उस अनकहे इतिहास की साक्षी है, जिसे वह नीले निशानों, झुकी आँखों और मौन सहमति के बीच ढोती रहती है। पिता से पति तक, देह से धर्म तक, वह हर भूमिका निभाती हुई अपनी इच्छाओं को अवर्जित कर देती है। अहिल्या, द्रौपदी, उर्मिला और सीता की तरह वह सदियों से अग्नि-परीक्षाओं में झोंकी जाती है फिर भी सृजन करती है, सहती है और अंत तक एक अभेद रहस्य बनी रहती है

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कितनी अमायरा!

अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।

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कासे कहूं

घरेलू हिंसा की मार झेलती मालती अपने दर्द को सहजता से बयान कर देती है, जबकि उसकी मालकिन मिसेज सुजैन अपने ही जख्म छुपाए बैठी हैं। कहानी निम्न वर्ग और उच्च वर्ग के बीच पनपती एक समान पीड़ा को उजागर करती है. जहां मार खाने की आदत समाज के नजरिए से तय होती है, लेकिन दर्द हर औरत का एक-सा होता है।

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स्वयंसिद्धा

ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठी मैं अपने भीतर के तूफ़ानों को सुन रही थी। एक युवक आया और बोला. “कितनी भव्य है ये नदी।” मैंने कहा “हाँ, पर इसे बहने के लिए गिरना, टूटना पड़ा है। इसी टूटने में इसकी पहचान है।”

मैंने अपने हाथों को देखा — हर झुर्री जैसे किसी मोड़ का निशान। बोली — “हर औरत के हिस्से में भी एक नदी होती है, जो बहती है, कभी बाढ़ बनती है, कभी शांत, लेकिन अंत में अपने सागर तक पहुँच जाती है।” वो चुप रहा, बस मुझे ऐसे देखा जैसे कोई नदी को देखता है। अब वो मुझसे अपने उत्तर खोजता है, और मैं मुस्कुरा देती हूँ क्योंकि जवाब किताबों में नहीं, नदियों में बहते हैं। मैं स्वयंसिद्धा हूँ. अपने भीतर के ब्रह्मपुत्र को स्वीकार कर चुकी हूँ। अब मुझे कहीं पहुँचना नहीं, बस बहते रहना है।

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दो मुंह वाली प्याज़

शुक्रवार की शाम सब्ज़ी मंडी में पहुँची अंजली को आज सिर्फ़ प्याज़ नहीं, ज़िंदगी का गहरा सच दिखा। दुकानदार ने कहा — “मैडम, ये दो मुँह वाली प्याज़ है, इसलिए सस्ती है।”
उस पल अंजली को एहसास हुआ कि इस दुनिया में दो मुँह वाले सिर्फ़ प्याज़ नहीं, इंसान भी हैं — फर्क बस इतना है कि प्याज़ के दो मुँह की गारंटी तो सब्ज़ीवाला देता है, पर आदमियों के दो मुँह और गिरगिट जैसे रंगों की कोई गारंटी नहीं। व्यंग्य और यथार्थ के इस संगम में कहानी आधुनिक स्त्री के भीतर छिपे आक्रोश, व्यथा और आत्मबोध को उजागर करती है।

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प्रेम का वादा, पीड़ा का सच

नारी का हृदय प्रेम में जितना कोमल होता है, पीड़ा में उतना ही कठोर अनुभवों से गुजरता है। प्रेम से पीड़ा तक का यह सफ़र उसकी संवेदनाओं को भीतर तक झकझोर देता है। धोखा, अपमान और परित्याग उसके आत्म-सम्मान को धज्जी-धज्जी कर देते हैं, कभी-कभी तो उसे जीवन-लीला समाप्त करने की कगार पर पहुँचा देते हैं।

फिर भी वही नारी आँसुओं में भी शक्ति ढूँढ़ लेती है। टूटकर भी वह बिखरती नहीं, बल्कि खुद को गढ़ लेती है—अपनी प्रतिमा, जिसमें प्राण फूँकने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं। यही उसका आत्मविश्वास है, यही उसकी सच्ची शक्ति।

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आज़ादी स्त्री की…

उस स्त्री की आत्मा कहती है—”मैंने हमेशा यही सोचा था कि मैं आज़ाद हूँ। पर हर पड़ाव पर बंधनों ने मुझे जकड़ लिया।
कभी भाई ने मेरे वस्त्रों पर नियंत्रण किया, कभी सास ने मेरी इच्छाओं को ढकने के लिए पल्ले और क्लिप्स थमा दिए। जीवन भर मैंने परंपराओं, रिश्तों और सामाजिक मान्यताओं के नाम पर अपने अस्तित्व को ढका। और फिर मृत्यु आई। सफेद चादर में लिपटी मैं, अपनी ही देह को राख होते देखती रही।

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नारी — जननी भी, शक्ति भी

नारी गहनों या दौलत की चाह नहीं रखती, उसे चाहिए सिर्फ़ सम्मान और बराबरी का हक़। वह माँ है, बहन है, बेटी है और पत्नी है—हर रूप में जीवन को सँवारती है। उसके भी अपने सपने हैं, अपनी इच्छाएँ हैं। लेकिन समाज अक्सर उसे कमज़ोर समझकर उसकी स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करता है। सच्चाई यह है कि नारी कोमल ज़रूर है, पर निर्बल नहीं। वह कर्तव्यों का पालन करती है और प्रेम से जीती है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उसकी भावनाओं और अस्तित्व का सम्मान करें।

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“देह, निर्णय और दरारें”

पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?

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