सच्चे दोस्त

दो छोटी सहेलियाँ एक-दूसरे का हाथ थामे मुस्कुराती हुईं, सच्ची दोस्ती, विश्वास और अपनत्व का भावनात्मक दृश्य।

मौसमी चंद्रा, पटना

कुक्कू आज फिर उदास थी।

क्यों?

वही एक ही कारण! झिलमिल से फिर झगड़ा हो गया था।

ये झिलमिल न, हर बार छोटी-छोटी बातों पर झगड़ लेती है और फिर कुक्कू को मुँह फुलाना पड़ जाता है!

पिछले महीने ही कुक्कू ने अपना ग्यारहवाँ जन्मदिन मनाया था। मम्मी ने झिलमिल की पसंद के शक्करपारे बनाए थे और क्या बनाया था… हाँ! चकली!

कोई बात हुई भला! जन्मदिन कुक्कू का और नाश्ता बना झिलमिल की पसंद का!

फिर भी वह गुस्सा नहीं हुई। जबकि माँ कहती हैं, “कुक्कू, तू ही बात-बात पर मुँह फुलाती है!”

सब उसे ही बुरा कहते, झिलमिल को कोई कुछ नहीं कहता।

कुक्कू रुआँसी हो गई।

उसने उँगलियों पर गिनती की। इस महीने कुल मिलाकर पूरे आठ बार उनका झगड़ा हुआ।

उसके हिसाब से तो गलती हर बार झिलमिल की ही थी।

अब जैसे कुक्कू को उसकी ड्राइंग बुक पसंद आ गई थी, पर उसने नहीं दी! माँगने पर भी नहीं दी!

फिर उस दिन सूरजमुखी पर उसी रंग की तितली बैठी थी। कुक्कू बस पकड़ने ही वाली थी कि झिलमिल ने तितली को उड़ा दिया और बोली—

“तितली को पकड़ना नहीं चाहिए, उसके पंख टूट जाते हैं!”

हाँ तो टूट जाएँ! कुक्कू को क्या! बड़ी आई नसीहत देने वाली! दोस्ती पहले है या तितली के अदने से पंख!

इस पर कोई कैसे न गुस्सा होता!

दो दिन तक दोनों की बात बंद रही। फिर झिलमिल खुद ही गोली लेकर उसे मनाने आई थी। खट्टी-मीठी गोली, जो स्कूल के बाहर बिकती थी। इतनी चटपटी कि खाओ और भूल जाओ गुस्सा-वुस्सा!

पर ये झिलमिल है न! बिल्कुल अजीब लड़की है। आदत से लाचार! कुक्कू को ऐसे समझाती रहती, जैसे वह छोटी बच्ची हो!

“ये मत करो! इससे मत बात करो!”

पल में दोस्त, फिर पल में टीचर!

इतना कोई सिखाता है क्या!

खैर…

क्लास में एक नई लड़की आई थी—रुचिका!

उसके पापा उसकी हर बात मानते थे। तभी तो रोज नई-नई चीजें दिलाते! पेंसिल बॉक्स फटती भी नहीं कि दूसरी आ जाती, कलर पेन खत्म भी नहीं होता तो एकदम नया, चकाचक दूसरा पैकेट!

उससे खूब बनने लगी थी कुक्कू की। अपनी पेंसिल, कलर सब इस्तेमाल करने देती थी और उसे किसी बात पर टोकती भी नहीं थी।

नई दोस्ती ने पुराने रिश्ते भुला दिए। झिलमिल उदास रहने लगी।

स्कूल के पीछे एक बड़ा-सा मैदान था। उसमें अजीब-अजीब से जंगली पेड़ उगे थे।

सारे बच्चों को सख्त हिदायत थी कि कोई भी उधर न जाए।

कुक्कू को तो उल्टा ही करने की आदत थी। उसने रुचिका को किसी तरह मना लिया साथ चलने के लिए।

दोनों चलते गए… काँटों वाली झाड़ियाँ, कहीं कैक्टस, कहीं विषैली गंध वाले फूल!

दोनों थोड़ा ही आगे गए थे कि—

धब्बब्ब…!

बड़ा-सा गड्ढा! करीब 12-15 फीट गहरा!

कुक्कू को ही फँसना होता है ऐसी जगहों में!

उसने रुचिका को आवाज लगाई—

“रुचिका! निकालो मुझे!”

पर कोई होता तो सुनता न! उसकी नई दोस्त तो एक-दो-तीन…

कच्चे दोस्त ऐसे ही होते हैं। पहले खूब अपना-अपना करेंगे और फिर जब आप पर मुसीबत आएगी तो छूमंतर!

कुक्कू गिरी पड़ी थी। रो-रोकर उसका गला सूखने लगा था।

“कुक्कू! डर मत! अभी बाहर आ जाएगी तू!”

आवाज़ आई।

ये किसने कहा?

कुक्कू ने चेहरा ऊपर उठाया।

अरे! ये तो… झिलमिल!

साथ में थे गार्ड अंकल!

थोड़ी ही देर बाद कुक्कू बाहर थी। हाँ, उसकी कोहनी हल्की-सी छिल गई थी, पर कुछ चोटें जरूरी होती हैं!

दोनों सहेलियाँ एक-दूसरे के गले लगी थीं।

झिलमिल अभी भी उसे डाँट रही थी—

“क्या जरूरत थी तुझे यहाँ आने की! कोई बात नहीं मानती! आगे से ऐसा किया न, तो मैं कट्टी!”

पर आज उसकी बातों पर कुक्कू को जरा भी गुस्सा नहीं आ रहा था।

वह जान गई थी कि सच्चे दोस्त वही होते हैं, जो गलत करने से रोकते हैं और हमेशा साथ देते हैं।

कल कुक्कू झिलमिल के लिए खट्टी-मीठी गोली लेकर आएगी और माँ से कहेगी कि फिर से शक्करपारे बनाएँ।

उसकी सबसे अच्छी दोस्त को पसंद हैं न!

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