
प्रमिला पांडे
सुन, तू इतनी सहज नहीं है, जितना मैंने जाना,
पत्थर की चट्टान सरीखी, केवल नाम ठिकाना।
घने जंगलों से तू गुज़री, पथ से कंटक निवारे,
खुशियों की मणिमाला गूंथी, हर एक दुःख को वारे।
दिन ढल जाता सूरज के संग, फिरता तिमिर पुराना,
पत्थर की चट्टान सरीखी, केवल नाम ठिकाना।। (1)
इस कलयुग में देते धोखा, अपने ही अपनों को,
धन-दौलत की खातिर करते चूर सभी सपनों को।
बांध लिए कुछ ऐसे बंधन, जिसका जग दीवाना,
पत्थर की चट्टान सरीखी, केवल नाम ठिकाना।। (2)
मय के प्यालों में डूबी, गुमशुदा जवानी तेरी,
बाल-वृद्ध, नर-नारी भटके, सुनी कहानी तेरी।
संत, फकीर, पादरी देखे, ढूंढें एक वीराना,
पत्थर की चट्टान सरीखी, केवल नाम ठिकाना।
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