टूट जाती हूँ जब…

वृद्धाश्रम के कमरे में खिड़की के पास बैठी एक वृद्ध माँ, आँखों में आँसू और हाथों में परिवार की पुरानी तस्वीर, बाहर दीपावली की रोशनी और भीतर गहरा अकेलापन।

प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तरप्रदेश)

टूट जाती हूँ जब
एक माँ को वृद्धाश्रम में
रोते हुए देखती हूँ।
उसकी ज़िंदगी का हर पल
कम होते देखती हूँ।

मिलकर भी मुझसे वह
मन की बात बताती नहीं,
“बहुत अच्छी हूँ” कहकर
बेटे के राज दिखाती नहीं।

बेटा गया है दूर विदेश कमाने,
छोड़ गया है मुझे
मनोरंजन के बहाने।

अरे! मेरे घर तो खुशियों की
भरमार छाई है,
बस कई दिनों से
बहू-बेटी मिलने नहीं आई हैं।

रोटी के हर निवाले को
वह आँसू संग निगलती है,
हृदय के ज्वालामुखी की आग में
उसकी ममता अकेले में पिघलती है।

जब भी कोई त्योहार
नज़दीक आता है,
दिल उसका भावनाओं के
झरने में बह जाता है।

रोज़ सपने बुनती है
अपनी यादों के धागे से,
रफ़ू कर देती है अपना मर्म
उम्मीद के टाँकों से।

हर तरफ़ दिवाली की चमक है,
पर मन में उसके अँधेरा है,
आँखें हैं नम,
अतीत की स्मृतियों ने उसे घेरा है।

बच्चों पर जान लुटाने वाली माँ
तड़प-तड़प कर बेहाल है।
क्या संस्कार दिए हैं शिक्षा ने?
पढ़-लिखकर बेटा कर रहा कमाल है।

जिस गोद में कभी
बिना थके दिन गुज़ार दिए,
आज उसका बोझ नहीं उठा सकते?
वृद्धाश्रम में देकर
कर्ज़ उतार दिए।

पर वक्त की चेतावनी मत भूलो,
कर्मों पर चढ़ती नहीं कभी धूल।

जिस दर्द में आज
माँ-बाप तड़पते हैं,
तुम्हारे बच्चों के बीच भी
उसके बीज पनपते हैं।

जो आज बोया है,
वही भविष्य में काटते हैं।

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