सच्ची लगन
अर्चना ज्ञानी, उज्जैन कर्मनिष्ठा और निरंतर प्रयास सेउच्च शिखर पर बढ़ती रहो। अपनी लक्ष्मण-रेखास्वयं खींचकर,मान-सम्मान की गरिमामयीघृत-दीपज्योति बनो। पवित्र आँगन की श्याम तुलसी,चौरे की राम तुलसी जैसी मर्यादित,सागर-सी गंभीरता,आकाश-सी विशालता लिए,नभ में अरुंधति-सी चमकती रहो। मेरे आँगन में हल्दी-कुंकू की रंगोली-सीसदा तुम दमकती रहो।मेरे पावन संस्कारों में पली,चेहरे पर मर्यादा-मोहिनी सजाए,सदा तुम चहकती रहो। माँ…
