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भारतीय युवा चर्चा करते हुए

क्या भारत का Gen Z गालीबाज है?

क्या कुछ लोगों के व्यवहार के आधार पर पूरी Gen Z पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करना उचित है? यह विचार लेख शिक्षा, संस्कार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर चर्चा करता है। लेखक का मत है कि भारत के अधिकांश युवा मेहनती, जागरूक और संस्कारी हैं तथा कुछ घटनाओं के आधार पर पूरी पीढ़ी की छवि बनाना उचित नहीं है। यह लेख समसामयिक मुद्दे पर संवाद और आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है।

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भारतीय परिवार की तीन पीढ़ियाँ सम्मानपूर्वक संवाद करती हुईं, जहाँ नई पीढ़ी आत्मविश्वास से अपनी बात रख रही है।

क्या यह कम है ?

क्या संस्कार का अर्थ केवल आज्ञाकारिता है, या सच कहने का साहस भी? यह लेख उस पीढ़ी की कहानी है जिसने स्वयं चुप रहकर जीवन जिया, लेकिन अपने बच्चों को प्रश्न पूछना, तर्क करना और सम्मान के साथ अपनी बात कहना सिखाया।

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यूट्यूब और सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लील सामग्री के दुष्प्रभाव तथा भारतीय समाज और संस्कारों पर उसके प्रभाव का प्रतीकात्मक दृश्य।

बेशर्मी का बाज़ार

यूट्यूब और सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लील सामग्री के बीच भारतीय संस्कार, पारिवारिक मूल्य और महिलाओं की सुरक्षा जैसे गंभीर सामाजिक प्रश्नों पर यह लेख चिंता व्यक्त करता है। क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर परोसी जा रही गंदगी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए खतरा बनती जा रही है?

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एक भारतीय वृद्ध दम्पति पार्क की बेंच पर बैठे हैं। उनके सामने बेटा-बहू हाथ जोड़कर क्षमा माँग रहे हैं, जबकि आसपास समाज के लोग और अधिकारी खड़े हैं। वातावरण भावुक, आशावान और पारिवारिक मेल-मिलाप का प्रतीक है।

हर्ष के अंकुर

‘फिर हर्ष के अंकुर फूटने लगे’ एक मार्मिक सामाजिक कहानी है, जो बताती है कि माता-पिता का सम्मान केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि परिवार की सबसे बड़ी पूँजी है। उपेक्षा, अकेलेपन और पीड़ा से जूझ रहे एक बुजुर्ग दम्पति की कहानी तब नया मोड़ लेती है, जब समाज, प्रशासन और परिवार मिलकर रिश्तों को टूटने से बचाने का प्रयास करते हैं। पश्चाताप, क्षमा और सेवा के भाव से यह कहानी मानवीय संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श करती है।

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सीरत और सूरत के अंतर को दर्शाती हिंदी कविता, जिसमें चरित्र, संस्कार और आंतरिक सुंदरता की महत्ता का वर्णन किया गया है।

सीरत और सूरत

बाहरी सुंदरता समय के साथ फीकी पड़ सकती है, लेकिन अच्छे संस्कार, चरित्र और सौम्यता जीवनभर व्यक्ति की पहचान बने रहते हैं। सीरत और सूरत के अंतर को दर्शाती यह कविता पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

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वृद्धाश्रम के कमरे में खिड़की के पास बैठी एक वृद्ध माँ, आँखों में आँसू और हाथों में परिवार की पुरानी तस्वीर, बाहर दीपावली की रोशनी और भीतर गहरा अकेलापन।

टूट जाती हूँ जब…

वृद्धाश्रम में रह रही एक माँ के मन की पीड़ा, बच्चों के प्रति अटूट प्रेम और उपेक्षा के दर्द को अभिव्यक्त करती यह मार्मिक कविता पाठकों को रिश्तों, संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है।

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अपने परिवार के साथ खड़े एक स्नेही और संघर्षशील भारतीय पिता का भावपूर्ण दृश्य, जो प्रेम, त्याग, सुरक्षा और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है।

पिता का प्रेम

पिता केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि परिवार की नींव, विश्वास का स्तंभ और त्याग का दूसरा नाम हैं। प्रस्तुत है पिता के प्रेम, संघर्ष और समर्पण को समर्पित एक हृदयस्पर्शी कविता।

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आँगन में खड़ी बेटी को प्रेम और आशीर्वाद देते माता-पिता का भावनात्मक दृश्य।

सच्ची लगन

अर्चना ज्ञानी, उज्जैन कर्मनिष्ठा और निरंतर प्रयास सेउच्च शिखर पर बढ़ती रहो। अपनी लक्ष्मण-रेखास्वयं खींचकर,मान-सम्मान की गरिमामयीघृत-दीपज्योति बनो। पवित्र आँगन की श्याम तुलसी,चौरे की राम तुलसी जैसी मर्यादित,सागर-सी गंभीरता,आकाश-सी विशालता लिए,नभ में अरुंधति-सी चमकती रहो। मेरे आँगन में हल्दी-कुंकू की रंगोली-सीसदा तुम दमकती रहो।मेरे पावन संस्कारों में पली,चेहरे पर मर्यादा-मोहिनी सजाए,सदा तुम चहकती रहो। माँ…

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नारी शक्ति, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक मूल्यों को दर्शाती प्रेरक हिंदी कविता की यथार्थवादी छवि।

“नारी केवल देह नहीं”

नारी केवल देह नहीं” नारी के अस्तित्व, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव पर आधारित एक विचारोत्तेजक हिंदी कविता है। यह रचना नारी को केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि त्याग, ममता, शक्ति और संस्कृति की वाहक के रूप में देखने का संदेश देती है।

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डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे परिवार के सदस्य, लेकिन सभी मोबाइल में व्यस्त, पीछे अकेले बैठे बुजुर्ग।

सब साथ हैं… फिर भी अकेले

आज घरों में सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन रिश्तों में समय और अपनापन कम होता जा रहा है। यह लेख सिर्फ संयुक्त परिवारों के टूटने की नहीं, इंसानों के भीतर बढ़ते अकेलेपन की कहानी है।”

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