सब साथ हैं… फिर भी अकेले

डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे परिवार के सदस्य, लेकिन सभी मोबाइल में व्यस्त, पीछे अकेले बैठे बुजुर्ग।

सुनील परिहार, महिदपुर रोड, उज्जैन

कभी भारतीय घरों में शाम होते ही आंगन जीवंत हो उठते थे. दादी की कहानियाँ, माँ की आवाज़, पिता की सीख, बच्चों की शरारतें और रसोई से आती खाने की खुशबू यही भारतीय परिवार की असली पहचान थी. घर सिर्फ रहने की जगह नहीं होता था, वह एक भावनात्मक संसार होता था जहाँ हर दुख आधा और हर खुशी दोगुनी हो जाती थी. लेकिन आज धीरे-धीरे घरों की दीवारें तो खड़ी हैं, पर उनके भीतर रिश्ते कमजोर पड़ते जा रहे हैं. अब एक ही घर में रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से दूर हो चुके हैं.
किसी के हाथ में मोबाइल है, कोई लैपटॉप में व्यस्त है, कोई सोशल मीडिया में खोया है. पहले लोग घर लौटने की जल्दी में रहते थे, आज लोग घर में रहकर भी घर से जुड़े नहीं हैं. संयुक्त परिवारों का टूटना सिर्फ रहने की व्यवस्था बदलना नहीं है, यह भावनात्मक सुरक्षा के खत्म होने की शुरुआत है.आज बच्चों के पास महंगे खिलौने हैं, लेकिन दादा-दादी की कहानियाँ नहीं.
बुजुर्गों के पास दवाइयाँ हैं, लेकिन साथ बैठकर बात करने वाला कोई नहीं. पति-पत्नी के पास सुविधाएँ हैं, लेकिन रिश्तों में धैर्य और संवाद कम होता जा रहा है.
सब कुछ है-..बस अपनापन धीरे-धीरे गायब हो रहा है.पहले घरों में कमाई कम होती थी, लेकिन दिल बड़े होते थे.आज घर बड़े हो गए हैं, लेकिन लोग अपने-अपने कमरों तक सीमित हो गए हैं.संयुक्त परिवारों में मतभेद भी होते थे, लेकिन रिश्ते नहीं टूटते थे.अब छोटी-छोटी बातों पर लोग अलग हो जाते हैं, क्योंकि रिश्तों को निभाने का धैर्य कम होता जा रहा है.
सबसे ज्यादा असर नई पीढ़ी पर पड़ रहा है.बच्चे अब रिश्तों की गहराई नहीं, सिर्फ औपचारिकताएँ सीख रहे हैं.उन्हें यह समझाने वाला कोई नहीं कि परिवार सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, बल्कि कठिन समय में बिना शर्त साथ खड़े रहने का नाम है.
और बुजुर्गवे धीरे-धीरे घरों में जरूरत से जिम्मेदारी बनते जा रहे हैं.उनकी आँखें आज भी दरवाजे पर किसी अपने के आने का इंतजार करती हैं.लेकिन भागती जिंदगी के पास अब उनके लिए समय कम पड़ता जा रहा है.सवाल सिर्फ संयुक्त परिवार बचाने का नहीं है.सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ियाँ रिश्तों की गर्माहट महसूस कर पाएंगी?
क्या बच्चों को कभी वह एहसास मिलेगा कि घर लौटते ही कोई बिना वजह पूछे- खाना खाया क्या?आज जरूरत आधुनिकता छोड़ने की नहीं, बल्कि रिश्तों को बचाए रखने की है.जरूरत इस बात की है कि दिन में कुछ समय मोबाइल से नहीं, अपने लोगों से जुड़ने में बिताया जाए.साथ बैठकर खाना खाने की आदत फिर लौटाई जाए.त्योहार सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट न बनें, परिवार के साथ बिताए गए पल बनें.क्योंकि आखिर में इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत पैसे की नहीं,अपनेपनकी होती है.घर तब तक घर है,जब तक उसमें साथ बैठने वाले लोग हैं.वरना ईंट-पत्थरों की इमारतें तो शहरों में बहुत हैं.

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