
स्वरा सुरेखा अग्रवाल (उत्तरप्रदेश)
वह सत्रह और सोलह साल की उम्र को
रोज जीती हूँ मैं,
पल भर उसके साथ…!!
शांत समंदर-सा
हर बात को हौले से
उतार लेता है अपनी उम्र में…
जी भर हँसती हूँ
उस मासूम यौवन के साथ,
शरारतें अपने आप
उभर आती हैं
मन की काया पर…!!
हाँ, पल भर को
लज्जा के आवरण को
उतार फेंकती हूँ
उसकी परिधि में।
हाँ, संभाल लेता है मुझे वह
अपनी मर्यादा में रहकर…!!
आँखों से उतरता है
मेरी धड़कनों में,
हौले से पल्लू में सिमट
रह जाता है
एक हलचल-सा बनकर…!!
पाज़ेब की आवाज़ के साथ
तालमेल करते हैं
उसके मासूम संवाद।
हाँ, थोड़ा बचपन
वह भी जी लेता है,
मेरी हथेलियों को
अपने हाथ में लेकर…!!
उसकी शरारतें अक्सर मुझे
ले जाती हैं
माँ के आँचल के पास।
और यही वजह है कि
मैं उसे
छुपा लेती हूँ
अपने आँचल में,
जी लेने के लिए
कुछ पल बचपन के।
हाँ, यह सच है —
सोलह-सत्रह की उम्र
अक्सर बाँट लेती हूँ उससे,
ताकि बनी रहे
एक मुस्कान
इस जिस्म की उम्र पर…!!
हौले-हौले उतरते हैं हम
एक-दूजे की आँखों की
मुस्कुराहट में…
सुनो…!!
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बहुत खूब