संतुष्ट मुस्कान

गाँव की पगडंडी पर स्कूल बैग लेकर मुस्कुराती हुई एक मासूम बालिका, संतोष और सादगी का प्रतीक।

शुभा मिश्रा, जसपुर (छत्तीसगढ़)

इस बेचैन समय में,
जब संवेदनाएँ खो-सी गई हैं,
इस उत्तप्त धरती पर
यदा-कदा टपकते मेघ तो हैं,
पर धधकती कामनाओं के लिए
संतुष्टि के शीतल फाहे कहाँ?

निःशब्द भीतर जमा होती रहती हैं
कच्ची-पक्की हिचकियाँ।

मृत्यु चौखट पर खड़ी मुस्काती है,
एक लोटे जल से प्यास बुझती नहीं,
कामनाओं का ज्वर उतरता नहीं।

एक-एक कर पूर्ण होती कामनाओं
के पहाड़ पर चढ़ते हुए,
निस्तेज आँखों और देह के साथ
आत्मा भी मलिनता की ओट में
छुप उम्मीद का माथा चूमती है।

लाख जतन कर भी नहीं ढूँढ़ पाती
सब कुछ पा जाने वाली सजीली मुस्कान।

आवाक-सी रह जाती हूँ जब
औचक ही दिख जाती है
वही सजीली मुस्कान —
गाँव की पगडंडियों पर छलाँगें लगाती
उस बालिका की पीठ पर बँधी स्कूल-बैग
और उससे झरती
वो सजीली, संतुष्ट मुस्कान!

लेखिका के बारे में-
शुभा मिश्रा
समकालीन हिंदी साहित्य की संवेदनशील और सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी जीवन के सूक्ष्म भावों, स्त्री मन की गहन अनुभूतियों और मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सहजता और आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त करती है। बिहार की सांस्कृतिक धरती गया में जन्मी शुभा मिश्रा ने विधि की शिक्षा प्राप्त कर वकालत के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई, वहीं साहित्य साधना को भी निरंतर समर्पण के साथ आगे बढ़ाया।
उनकी रचनाओं में जीवन का यथार्थ, रिश्तों की ऊष्मा, प्रकृति की सुंदरता और मनुष्य के भीतर चलने वाले भावनात्मक द्वंद्व अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरते हैं। उनकी कविताएँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि संवेदनाओं की ऐसी यात्रा हैं जो पाठकों के अंतर्मन को स्पर्श करती हैं।
प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही उनकी रचनाएँ पाठकों के बीच विशेष सराहना प्राप्त कर चुकी हैं। उनके एकल काव्य संग्रह “मन्नतों के धागे” और “अम्बुबाची” उनकी साहित्यिक संवेदना और रचनात्मक गहराई के सशक्त उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त अनेक साझा काव्य संकलनों में भी उनकी रचनात्मक उपस्थिति उल्लेखनीय रही है।
व्यवसाय से अधिवक्ता और स्वभाव से संवेदनशील सृजनधर्मी शुभा मिश्रा की लेखनी जीवन के अनकहे पक्षों को स्वर देती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए आमंत्रित करती हैं।

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