
डॉ. रत्ना मानिक, जमशेदपुर
मैं डरती हूँ
तुम्हारे बेबाक प्रश्नों से।
बर्फ़-सी खामोश ठंडक समेटे
तुम्हारे एक-एक शब्द
मुझे अग्नि-शलाकाओं-सा
भीतर तक सुलगाते हैं।
क्या वाजिब जवाब है
तुम्हारे प्रश्नों का…?
करती हूँ सवाल ख़ुद से।
प्रश्न…!
जिनसे जूझती हूँ मैं
रात्रि की नीरवता में,
मन की विह्वलता में।
टटोलती हूँ उनका
कोई वाजिब-सा उत्तर।
फिर सोचती हूँ,
क्यों न उन्हें वातावरण में
रज-कणों की तरह
यूँ ही अनुत्तरित छोड़ दूँ।
या
किसी इमरोज़ की आँखों की मौन तड़प में
उन प्रश्नों को
आहिस्ता-आहिस्ता घुलने दूँ,
ताकि पुनः रचा जा सके
पीड़ा का एक अंतहीन,
अनोखा इतिहास।
या
किसी चुलबुली अमृता की
चाहत की चाशनी में पगी
बेबाक मोहब्बत की तरह
उन प्रश्नों को
इश्क़ की शोखी से
अठखेलियाँ करने दूँ,
ताकि इश्क़ के आसमान पर
फिर उकेरा जा सके
मोहब्बत का एक नया इंद्रधनुष।
ज़िंदगी के कई अनसुलझे लम्हे भी
भविष्य की कोख में
हौले-हौले श्वास लेते हैं।
मन फिर भी अकुलाता है,
प्रश्नों के बोझ से छटपटाता है।
बटोर कर तन का पूरा साहस,
देना चाहती हूँ तुम्हें जवाब।
लरज उठते हैं हौले से
होंठ मेरे,
मुट्ठियाँ पसीने से तर हो जाती हैं।
फिर सीप से टपक पड़ते हैं
विवशता के दो बूंद
खारे-खारे से।
मन के कोरे पन्ने पर
मोहब्बत का कोई सुनहरा हर्फ़,
जो अब तक न लिखा गया हो।
तो अब
कैसे लिखने दूँ वक्त को
अमृता और इमरोज़-सी
एक और अधूरी दास्ताँ…॥

वाह बहुत सुंदर,दिल को छू लेने वाली पंक्तियां❣️