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अम्मां के आंचल और गांव की पुरानी यादों को दर्शाता रामगढ़ गांव का ग्रामीण दृश्य

मेरा गांव जैसे अम्मां के आंचल की छांव 

सन् 1976 का रामगढ़ गांव, अम्मां का स्नेह, मिट्टी की खुशबू, लालटेन की रोशनी, चूड़ियों की छन-छन, दशहरे का मेला और बचपन की बेफिक्र दुनिया. यह संस्मरण उस समय की याद दिलाता है जब गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि रिश्तों, संस्कारों और अपनापन से भरी पूरी दुनिया हुआ करता था.

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मीरा तुम कहाँ हो? एक अधूरी दोस्ती और आदिवासी लड़की के संघर्ष की मार्मिक कहानी

मीरा तुम कहाँ हो

तीन दशक पहले मिली एक आदिवासी लड़की मीरा, जो पढ़ाई में बेहद होशियार थी और जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी। लेकिन परिस्थितियों ने उसकी राह रोक दी। वर्षों बाद हुई एक मुलाकात ने दोस्ती, सपनों और बिछड़ने की ऐसी कहानी छोड़ दी, जिसका सवाल आज भी कायम है मीरा तुम कहाँ हो?

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शहर में अपने लापता बेटे की तलाश करती बिहार की एक संघर्षशील माँ

तलाश

बिहार के एक छोटे से गाँव की सावित्री अपने लापता बेटे की तलाश में शहर पहुँच जाती है। अनेक कठिनाइयों और संघर्षों के बावजूद वह हार नहीं मानती और अपनी ममता की ताकत से अपने बेटे को ढूँढ़ निकालती है। यह कहानी माँ के अटूट प्रेम और साहस का अद्भुत उदाहरण है।

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गाँव की पगडंडी पर स्कूल बैग लेकर मुस्कुराती हुई एक मासूम बालिका, संतोष और सादगी का प्रतीक।

संतुष्ट मुस्कान

अधूरी इच्छाओं और भागती जिंदगी के बीच सच्ची संतुष्टि कहाँ मिलती है? “संतुष्ट मुस्कान” कविता एक मासूम बालिका की मुस्कान में जीवन का गहरा दर्शन खोजती है।

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भारी बारिश और बाढ़ के बीच नदी किनारे खड़ा एक गरीब ग्रामीण व्यक्ति, दूर झोपड़ी की ओर देखते हुए भावुक और चिंतित मुद्रा में।

जिजीविषा

कोसी नदी के उफान, गरीबी और लाचारी के बीच घिरा मंगरु एक पल के लिए हार मानने को तैयार हो जाता है, लेकिन पत्नी और बेटी का चेहरा उसे फिर जीने की ताकत दे देता है। “जिजीविषा” जीवन से हार न मानने की मार्मिक कथा है।

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सावन की चूड़ियां: नवविधवा बहू और बड़की काकी

बहती संवेदना

सावन की फुहारों और रंग-बिरंगी चूड़ियों के बीच बुनी यह कहानी एक नवविधवा बहू के मन के सूनेपन और फिर से जागती उम्मीद की मार्मिक झलक दिखाती है, जहाँ जीवन अपने दर्द के साथ भी आगे बढ़ना सीखता है।

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कुएँ में गिरने का रोमांचक अनुभव, 4 साल की मासूम बालिका चमत्कारिक रूप से बची

कुएँ में गिरना

भागलपुर में बचपन की एक दिल दहला देने वाली घटना, जब 4 साल की बच्ची खेल-खेल में कुएँ में गिर गई, लेकिन भगवान की कृपा से सुरक्षित बाहर निकाल ली गई. पढ़ें पूरा संस्मरण.

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बाढ़ से डूबता गांव और हाथ में किताब लिए खड़ी उदास बच्ची

“झूठा गांव”

“झूठा गांव” एक भावनात्मक कहानी है जिसमें किताबों के सुंदर गांव और बाढ़ से जूझते वास्तविक गांव का अंतर दिखाया गया है। गंगा की भीषण कटान के बीच एक बच्ची के टूटते सपनों की मार्मिक प्रस्तुति पाठकों को भीतर तक झकझोर देती है।

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नानी के गाँव में चूल्हे पर रोटी बनाती दादी और नीम की छाँव में खेलते बच्चे

याद आता है पुराना जमाना

यह कविता बचपन की उन सरल और सच्ची यादों को जीवंत करती है, जब नानी का गाँव, चूल्हे की रोटी, नीम की छाँव, पाठशाला के संस्कार और बिजली जाने पर चिमनी की रोशनी जीवन का हिस्सा थे। “याद आता है पुराना जमाना” सिर्फ स्मृतियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस सादगी, अपनापन और संस्कारों की दुनिया की भावनात्मक पुनर्स्मृति है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं पीछे छूट गई है।

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बसंत ऋतु में खिले फूलों, कोयल और भँवरे के बीच प्रकृति सौंदर्य निहारती भारतीय ग्रामीण स्त्री

ऋतु बसंत आयो री…

“ऋतु बसंत आयो री” प्रकृति के नवजीवन, प्रेम और उल्लास का काव्यात्मक उत्सव है। शीतल बयार, खिले सुमन, कोयल की कूक और मन के हिलोर के माध्यम से यह कविता बसंत ऋतु की जीवंत अनुभूति कराती है।

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