
गायत्री बंका, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
बच्चों का जीवन बड़ा ही चंचलमय होता है। मैं भी बचपन में बड़ी चंचल थी। घर में सबकी लाडली होने के कारण शरारती थी, मगर मैं उसे चंचलता ही कहूँगी। आज आपको मैं अपनी एक रोमांचक और दिल दहला देने वाली कहानी सुनाती हूँ।
मैं करीब 4 वर्ष की थी। कलकत्ता से अपनी नानी के घर भागलपुर गई थी। जून का महीना था। मेरी मौसी की शादी थी। घर में बहुत चहल-पहल थी। शादी के कारण सब लोग जमा हो गए थे। मेरी नानी के घर में कुआँ हुआ करता था। उसी से पानी खींचकर सभी काम किया करते थे। सुबह का समय था। मैं कुएँ के पास नहाने के लिए खड़ी थी। मेरे हाथ में मेरी ड्रेस थी और मैं अपनी माँ का इंतजार कर रही थी। मगर कौतूहलवश कुएँ में बार-बार झाँक रही थी। मेरी मौसी ने देखा तो कहा, रुक, मैं तेरी मम्मी को भेजती हूँ। मगर मैं तो ठहरी बड़ी चंचल। कुएँ में झाँकने लगी और झुकी, फिर क्या था — कुएँ में गिर पड़ी।
पानी बहुत कम था, मगर भगवान की कृपा समझिए कि मैं नीचे गिरकर सीधी खड़ी हो गई और चारों ओर हाहाकार मच गया। रविवार का दिन था। किसी को बुलाना भी बड़ा मुश्किल था। संयोग से कुएँ में उतरने के लिए एक आदमी मिल गया। उसने मुझे बाल्टी में बिठाकर बाहर निकाला।मैं बहुत सहम गई थी। बाकी घरवाले भी बहुत घबरा गए थे। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। और कमाल देखिए कि मैं इतनी चंचल थी कि अपनी ड्रेस भी हाथ से नहीं छोड़ी। यह दृश्य आज भी मेरे मस्तिष्क में घूमता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह तो भगवान की कृपा थी कि मुझे कोई चोट नहीं आई। आज यह कहावत सही लगती है —
अंत भला तो सब भला.

जकूर राखे साइयां मार सकेना कोई।। ईश्वर की कृपा से सब कुछ संभव है सुंदर संस्मरण
जी सही कहा आपने । धन्यवाद 🙏🏼