
संध्या यादव, मुंबई
अपनी पूर्व प्रेमिकाओं से
अक्सर मुझे मिलवाता है वो
मूँछों पर हाथ फेरकर
मंद-मंद मुस्कुराता है वो…
अपने प्रेम-संबंधों के किस्से
मर्दानगी के तमगे-सा
छाती फुलाकर, चमका कर
गर्व से सुनाता है वो…
सहकर्मियों, मित्रों और सहपाठियों को मेरे
बच्चों से “मामा” कहलवाता है वो,
और मेरे सजने-सँवरने,
हँसने-मुस्कुराने पर
आँखें तरेरकर
“चरित्रहीन” मुझे बताता है वो…
पैसों से कोई परेशानी नहीं उसे,
पर मेरे दफ़्तर जाने से बिदकता है वो,
मेरी आँखों में झाँककर
हर भाव की एक्स-रे करता है वो…
सोचती हूँ—
शब्दकोश कितने लाचार हैं
उसकी “एक्स”—
“बंदी” उसकी कहलाती है,
और मेरे सहज भावों पर
“चरित्र” का सवाल उठ जाता है…
मीम्स, रील्स और चुटकुलों को सुनाकर
मेरी कमअक्ली पर ठहाके लगाकर
सबको हँसाता है वो,
मगर अपनी हर बात को
हँसी में टाल जाता है वो…
उसका देर से घर आना
“वीकेंड” कहलाता है
और मेरी देर—
“अय्याशी” का नाम पाती है…
उसकी आज़ादी
उसका अधिकार है
मेरी आज़ादी
“फेमिनिज़्म” बन जाती है…
सोचती हूँ—
शब्दकोश को अब
थोड़ा समृद्ध करना होगा
कुछ शब्द हटाने होंगे,
कुछ अर्थ बदलने होंगे…
“एक्स”, “बंदी”, “छम्मक छल्लो”,
“बेब”, “आइटम”, “हॉट”, “सेक्सी”
जैसे सम्मानजनक आलंकारिक शब्दों को
बोलचाल की अंगीठी में ईंधन बना
राख कर देना चाहिए
सामाजिकता का पर्यावरण बच जाए शायद…
कुछ नए शब्द गढ़ने भी होंगे
ऐसे शब्द,
जिनमें “मर्द” और “औरत”
के लिए अलग-अलग
चारित्रिक उपमाएँ न हों…
क्योंकि एक ही रिश्ते में
दो अलग-अलग नैतिकताएँ
किसी भाषा की गड़बड़ी नहीं
सोची-समझी साजिश है।
