
आकृति मंडल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
ख़ामोशी में बहुत कुछ सह जाती हूँ,
जब बात अपनी इज़्ज़त की हो,
तो सबसे लड़ खड़ी हो जाती हूँ।
मेरे आँसू मेरी कमज़ोरी नहीं,
मेरे फिर से उठ खड़े होने की निशानी हैं।
मैं गिरकर, टूटकर, बिखरकर भी उठती हूँ,
क्योंकि मैं ख़ुद एक कहानी हूँ।
मैं झुकती नहीं,
अपनी पहचान ख़ुद बनाती हूँ।
जो मुझे रोक दे,
मैं उसे पीछे छोड़ जाती हूँ।
मैं ख़ुद की हिम्मत और आवाज़ हूँ।
जब समय बदलने का आता है,
तो मैं ख़ुद ही एक नई शुरुआत हूँ।
मेरी कहानी में दर्द भी है,
हौसला भी,
कुछ अधूरे ख़्वाब भी,
और उन्हें पूरा कर देने की ज़िद भी है।
मैं एक कहानी हूँ…!

बहुत ही सुंदर कविता..
ढेरों शुभकामनाएं 💘🌹💐
Atcha laga parhke