पापा

सौतेले पिता को गले लगाती भावुक बेटी, पारिवारिक प्रेम का मार्मिक दृश्य

रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर, बिहार

ऐनी गुमसुम सोफे पर पसरी थी।

“बेटा… कुछ बताओगी? क्या हुआ है? मेरी लाडो को ऐसी कौन-सी चिंता सता रही है?”

कुशन के नीचे से एक लिफाफा निकालकर ऐनी ने सिमरन की हथेली पर रख दिया।

“अच्छा, ये बात है! स्कूल में एनुअल फंक्शन है। चलेंगे न हम?”

ऐनी की उदास नजरें सिमरन के चेहरे पर टिक गईं। उसकी आँखों में सवाल थे। वह जानना चाहती थी “हम” का तात्पर्य क्या है?

उधर मोती बहुत खुश था इस बात से कि इस बार ऐनी के स्कूल वह जाकर रहेगा। कूद-फांद कर अपनी खुशी जाहिर कर रहा था।

“बेटा… पापा भी—”

“नहीं जाएंगे!”

कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर ऐनी फूट-फूटकर रोने लगी। दस्तक देता रह गया मोती।

“मीठी-मीठी बोली तेरी, प्यारी-प्यारी बातें,
काहे को चुप है लाडो मेरी, रीत है ये निराली।
तू ही मेरी आन है, शान मेरा श्रृंगार तू है,
बिटिया मेरी एक बार, आके लग जा गले।”

रूंधे गले से सिमरन गा रही थी, जो उसके पापा उसके लिए गाते थे।

गाना सुनते ही ऐनी कमरे से भागती आई और सिमरन की बाहों में सिमट गई। सिमरन के आँसू पोंछते हुए बोली—
“रोते नहीं… बुद्धू मम्मा!”

खुशी के मारे घूमर करने लगा मोती।

दरवाज़े पर खड़े, आँखों में आँसू लिए हरीश चुपचाप अपने कमरे में चला गया।

सिमरन हरीश के लिए पानी लेकर आई।

“सिमरन… कैसे मनाऊँ बेटी को?”

“बच्ची है… सब ठीक हो जाएगा, देखना।”

ऐनी की ज़िद से मोती भी स्कूल आया और खुश था।

ऐनी की नजरों से दूर हरीश उसके अभिनय और नृत्य प्रदर्शन को कैमरे में कैद कर रहा था।

स्कूल से आते समय ऐनी मोती के साथ बहुत खुश थी।

घर आते ही खाने की टेबल पर उसकी पसंद का मलाई पनीर और स्ट्रॉबेरी फ्लेवर का केक देखकर खुशी से उछल पड़ी—
“अरे वाह! मेरी मनपसंद!”

तभी उसकी नजर रसोई से कॉफी मग लेकर आते हरीश के मुस्कुराते चेहरे पर पड़ी।

“मुझे कुछ नहीं खाना!” गुस्से में प्लेट सरका दी ऐनी ने।

सिमरन ने चुप रहने का इशारा किया-
“मैं देखती हूँ…”

हरीश बोला—
“आज खास करके तुम्हारे लिए ये सब बनवाया है मैंने, लीना से कहकर।”

“…?”

“पूछ लो!”

“अच्छा! अब आप गलत तो नहीं कहेंगी न, मम्मा?”

“लीना आंटी! पापा के जैसा तो नहीं, पर स्वादिष्ट है।”

सुनकर हरीश को सुकून मिला।

बीतते समय के साथ हरीश और ऐनी की दूरियाँ कायम रहीं।

हरीश की कविताओं में ऐनी के लिए दर्द छलकता था।

अपने दोस्तों के बीच हरीश की चर्चा उसे नागवार लगती। वह चिल्ला पड़ती—
“बंद कर यार तारीफ करना! वो मेरा पापा नहीं है, कितनी बार बताऊँ?”

जुबान से नहीं, मन ही मन कविताओं की तारीफ करती थी, भले ही शब्दों के मर्म से अनजान थी ऐनी।

हरीश और ऐनी के रिश्ते में बढ़ती कड़वाहट देखकर सिमरन सोचने लगती

अकेली औरत, एक बेटी की माँ… ये जालिम दुनिया जीने नहीं देगी। जहाँ इंसानों के भेष में भेड़िए घूमते हैं, पहचान करना मुश्किल है कब, कहाँ से वार कर दें।

“बेटा, शादी कर ले। तुझे सहारा और ऐनी को पिता मिल जाएगा।”

मम्मी के कहने पर शादी तो कर ली हमने, पर ऐनी की खुशी लुप्त हो गई।

सिमरन खुद को ऐनी की दोषी मानती।

“भगवान, मैं नहीं जानती कि मैंने सही किया या गलत, पर मेरी बेटी खुश नहीं है। हमसे नाराज़ है। हमने सही नहीं किया। मुझे माफ कर दो। सब कुछ ठीक कर दो भगवान… मेरी मदद करो।”

इधर ऐनी तस्वीर से बात कर रही थी-

“पापा… आज मेरा जन्मदिन है। आप क्यों चले गए हमें छोड़कर? बस आपकी तरह मोती मेरा ख्याल रखता है…”

आँखें डबडबा गईं।

मोती अपनी उदास नजरों से उसे अपलक निहार रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि खुश और बकबक करने वाली ऐनी आज उदास और चुप क्यों है।

खुश करने के लिए वह उसकी बार्बी डॉल, स्केच बुक, तो कभी बॉल लाकर देता।

खुशी से चहककर हरीश बोला-
“ऐनी! देखो तुम्हारी पसंद की मिठाई और केक… हैप्पी बर्थडे, बेटा!”

“मम्मा, कह दो हरीश से… बेटी नहीं हूँ मैं उसकी, खामखाँ!”

“बेटा, ऐसे नहीं बोलते। बहुत प्यार करते हैं वो तुमसे। देखो, तुम्हारी पसंद के खिलौने और केक लेकर आए हैं।”

ऐनी की आँखों में साफ-साफ गुस्सा झलक रहा था।

“ठीक है, वो तुम्हारे पापा नहीं… दोस्त तो बन सकते हैं न?”

“…… ओके।”

“थैंक यू, हरीश। गिफ्ट अच्छा है।”

सब कुछ ठीक चल रहा था। फिर एक दिन अचानक ऐनी मोती के साथ कहीं निकल गई।

सबने बहुत ढूँढा। शाम हो गई, पर ऐनी…

“कहाँ चली गई थी बेटा? मम्मा कितना परेशान हो गई थी!”

“मम्मा…” लिपटकर रोते हुए बोली—
“आप लोगों से दूर जाना चाहती थी। चलते-चलते थक गई तो मंदिर में बैठ गई। बाहर आई तो मोती नहीं था। मम्मा… मो… मोती खो गया!”

हरीश ने वादा किया—
“मैं ढूँढ लाऊँगा मोती को।”

“सच, हरीश? मोती को तुम ले आओगे?”

हरीश मुस्कुराकर सिर हिलाकर हामी भरता है।

मोती की खोज में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी।

पुलिस भी अपने तरीके से खोज कर रही थी।

किसी ने कहा—
“डॉग्स शेल्टर में एक बार देख लो, शायद वहाँ मिल जाए।”

तीनों वहाँ गए, मगर मोती नहीं था।

ऐनी भगवान से कह रही थी
“आपने सही नहीं किया, भगवान जी। पहले मेरे पापा को और अब मोती को अपने पास बुला लिया। प्लीज, उन्हें मेरे पास भेज दो। कभी ज़िद नहीं करूँगी… प्लीज!”

घंटे की आवाज सुनकर हरीश ने पूछा—
“तुम आखिरी बार जब उसके साथ थीं, तो तुमने उससे क्या कहा था?”

“यही कि जब तक मैं वापस न आऊँ, तुम यहीं रहना… कहीं मत जाना।”

“चलो, फौरन!”

सवाल के जवाब में हरीश मौन था।

मंदिर के गेट पर पहुँचते ही ऐनी चिल्लाई
“मोooooतीईईई!”

दौड़कर मोती को गोद में उठा लिया।

हरीश स्नेहभरी आँखों से ऐनी की खुशी को देखकर मुस्कुरा रहा था।

अचानक दौड़कर आई ऐनी हरीश के गले लगकर बोली

“थैंक यू सो मच… पापा!”

One thought on “पापा

  1. बहुत अच्छी कहानी ।
    विधवा स्त्री के पुनर्विवाह पर वह खुद बहुत सी विपरीत स्थितियों से गुजरती है । परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग अनिवार्य है अगर सबको खुश रहना है ।

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