
डॉ.उर्मिला सिन्हा
यादें बचपन की हैं, जो इस उम्र में भी मन के तारों को झंकृत करने के लिए पर्याप्त हैं।
हम तीन बहनें हमेशा एक साथ रहती थीं। पढ़ाई-लिखाई, स्कूल जाना, खेलना-कूदना—सब कुछ साथ-साथ होता था। मेरे पिताजी चार भाई थे। मेरे बाबूजी मँझले थे और मैं उनकी आठवीं संतान, पेट-पोंछनी बेटी। मुन्नी बड़े चाचा की बेटी थी और वीणा छोटे चाचा की बेटी।
मैं और वीणा एक ही कक्षा में पढ़ते थे। हम तीनों हमेशा साथ-साथ रहते। हमें देखकर लोग कहते, “वह देखो, दुनिया गोल है।”
कोई पूछता, “वह कैसे?”
तो जवाब मिलता, “देखो सामने, बीच का खंभा लंबा है।”
असल में मेरा कद लंबा था और वीणा तथा मुन्नी मँझोले कद की थीं। मैं बीच में रहती और दोनों मेरे आजू-बाजू। देखने वाले इसी बात का आनंद लेते थे। हमें इन बातों से क्या! हम तो कूदते-फाँदते, मस्त अपने खेल-कूद में मग्न रहते।
मैं और वीणा एक ही स्कूल और एक ही कक्षा में पढ़ते थे। हम दोनों एक जैसे कपड़े पहनते, एक ही थाली में खाना खाते, खूब खेलते, पढ़ते, नाचते-गाते और खिलखिलाकर हँसते।
लाल मिर्च का चोखा, उसमें तेल-नमक मिलाकर खाना हमारे भोजन का अनिवार्य हिस्सा होता था और उसके बराबर के साझीदार होते हमारे प्रिय भतीजे पप्पू लाल। अचार की बड़ी-बड़ी फाँकें चाटना हमारा प्रिय शगल था।
हम दोनों इतने मस्त स्वभाव के थे कि जिस काम को हाथ लगाते, उसे पूरा करके ही छोड़ते। न आलस्य, न बहानेबाज़ी।
हमारा हाई स्कूल घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर था। उन दिनों आने-जाने का कोई साधन उपलब्ध नहीं था। पैदल ही आना-जाना पड़ता था। हम दोनों खुशमिज़ाज और समय के पाबंद थे। नहा-धोकर, लकड़ी के चूल्हे पर बने कच्चे-पक्के भोजन को खाकर समय पर घर से निकलते और कूदते-फाँदते निर्धारित समय से पहले ही स्कूल पहुँच जाते। उस समय न टिफ़िन का रिवाज़ था और न बोतल के पानी का।
साठ के दशक में हम दोनों बहनों को इतनी दूर देहात के हाई स्कूल में पढ़ने भेजना हमारे परिवार का एक क्रांतिकारी कदम था। हमें दूसरे गाँव के हाई स्कूल के प्रथम बैच में पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहाँ सह-शिक्षा थी।
हमारे स्कूल में पढ़ाई, अनुशासन, टेस्ट, प्रतियोगिताएँ और खेल-कूद—सब कुछ उच्च स्तर का था। उस विद्यालय की शिक्षा ने हममें नैतिकता, परिश्रम और अध्ययन का महत्व कूट-कूटकर भर दिया, जो आजीवन हमारे साथ रहा।
हमारी कक्षा में हम दोनों बहनों के अतिरिक्त चार और लड़कियाँ थीं। सभी अलग-अलग परिवेश से थीं। हम उनसे विभिन्न अवसरों के लोकगीत सीखते, उन्हें कॉपी में लिखते और घर आकर अपनी प्यारी रागिनी भाभी के साथ सुर-लय में गाते। हमने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली, लेकिन सोहर, शादी-विवाह और विभिन्न रस्मों के सैकड़ों गीत हमें कंठस्थ थे। फलस्वरूप घर-परिवार में होने वाले विवाहों में हम अपने मधुर गीतों से समाँ बाँध देते थे।
आम, लीची, जामुन और अमरूद के पेड़ों पर चढ़ना हमारे बाएँ हाथ का खेल था। तालाब में मछलियों को दाना खिलाना, गहरे पानी में कंकड़ फेंककर बुलबुले निहारना, एकट-दुकट, छुपन-छुपाई, गोटी, रस्सी कूद, साइकिल चलाना और दोल्हा-पाती खेलना हमारे प्रिय खेल थे।
दौड़ लगाने में हम दोनों इतनी माहिर थीं कि यह चिंता ही नहीं रहती थी कि गिरने पर घुटना छिलेगा या माथा फूटेगा। थोड़ा-बहुत छिल जाने पर गेंदा फूल की पत्तियाँ मसलकर उनका रस लगा लेते और बस—काम हो जाता।
चूँकि हम दोनों बहनें हर समय साथ-साथ रहती थीं, इसलिए घर के सभी लोग निश्चिंत रहते थे। उन्हें विश्वास था कि हम कोई ऐसा-वैसा काम नहीं करेंगी जिससे कोई परेशानी हो। बल्कि हम दोनों घर-बाहर के सभी कार्यों के लिए सदैव तत्पर रहती थीं। फलस्वरूप हमें बड़ों का आशीर्वाद और प्रोत्साहन भरपूर मिलता था।
हमारे यहाँ छठ पूजा बहुत धूमधाम से मनाई जाती थी। अर्घ्य के ठेकुओं के लिए चक्की में गेहूँ पिसवाया जाता था। हम दोनों नहा-धोकर श्रद्धापूर्वक छठ गीत गाते हुए पसेरी भर गेहूँ पीस देती थीं।
हमारा परिवार शिक्षित और संपन्न था। किसी भी बात की कमी नहीं थी। संयुक्त परिवार था—वृद्ध दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, भाई-बहन, भतीजे-भतीजियाँ, दीदी-जीजाजी और बच्चों से घर हमेशा भरा रहता था।
हम दोनों बहनें दौड़-भागकर सबकी ज़रूरतें पूरी करती थीं। मैं अपने दादाजी की लाड़ली थी, क्योंकि पढ़ाई में अव्वल थी और उनकी सेवा करने तथा उनकी बातें मानने में मुझे आनंद आता था।
हम आपस में खूब गपशप करतीं, ज़ोर-ज़ोर से हँसतीं। यूँ कहें कि हम दोनों पूरे परिवार की रौनक थीं। हमारे बीच कभी मनमुटाव या लड़ाई-झगड़ा नहीं हुआ।
फिर सांसारिक दस्तूर के अनुसार मेरी शादी हो गई। वीणा खूब रोई। मेरे बड़े बेटे की “आँख अंजाई, काजल लगाई” की रस्म भी वीणा ने ही निभाई। फिर उसका भी विवाह हो गया। वह अपने घर-गृहस्थी में मस्त हो गई।
पहले मायके के शादी-विवाह में हमारी भेंट हो जाती थी। हम दोनों साथ-साथ खूब आनंद मनाते। फिर तो सारी दुनिया एक ओर और हम दोनों एक ओर।
अब कई वर्षों से न भेंट हुई और न मुलाकात। किंतु मेरे हृदय में वीणा का स्थान बहन से अधिक “बेस्ट फ्रेंड” का है।
मोबाइल पर केवल “हाय-हैलो” से हमारा मन नहीं भरता। हमें मिलकर ढेर सारी बातें करनी हैं। खेत-खलिहान, चिड़िया-चुरुंग, गाछी-बगीचा, रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे भागना, फूलों के संग हँसना, बारिश के पानी में छप-छप करना, झूले पर पींगें भरना, कच्चे आम और इमली के चटखारे लेना, मटर, बूट और मकई का होरहा खाना, ज़ोर-ज़ोर से गाना, बेवजह ठहाके लगाना और अपने गुम हुए बचपन को एक बार फिर जीना है।
वह जहाँ भी रहे, खुश रहे—यही मेरी मंगलकामना है।
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