मंद मुस्कान के साथ खड़ी एक युवती, जिसकी आँखों में बचपन और प्रेम की मासूम यादें झलक रही हैं।

लम्हा

कुछ रिश्ते उम्र नहीं, एहसास जीते हैं। “लम्हा” कविता सोलह-सत्रह की मासूमियत, बचपन की खुशबू और प्रेम की कोमल मुस्कुराहटों को बेहद संवेदनशीलता से उकेरती है।

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पुरानी गलियों में खड़ा एक व्यक्ति बचपन की यादों में खोया हुआ, भावनात्मक दृश्य

वो गलियां

“वो गलियां” कविता बचपन की यादों, पुरानी गलियों और बीते समय की भावनात्मक यात्रा है। यह रचना बताती है कि अतीत हमें संवारता है, लेकिन भविष्य का निर्माण केवल आज के संघर्ष और प्रयासों से होता है। यादों और वर्तमान के बीच संतुलन का सुंदर संदेश देती कविता।

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गांव के खेतों और कच्चे रास्ते के बीच खड़ा एक व्यक्ति, जो बचपन की यादों में खोया हुआ है

गांव की माटी की वो खुशबू

शहर की भीड़ और ऊँची इमारतों के बीच खड़े होकर भी मन बार-बार उसी गांव की ओर लौट जाता है, जहाँ माटी की खुशबू, माँ के हाथों की गरमाहट और रिश्तों की सच्चाई आज भी दिल में ज़िंदा है।

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नानी के घर की छुट्टियां—बचपन की सबसे खूबसूरत यादें

वो जो छुट्टियां थीं

“वो जो छुट्टियां थीं” एक भावनात्मक और नॉस्टेल्जिक लेख है, जो हमें सीधे बचपन की उन सुनहरी यादों में ले जाता है, जहाँ नानी का घर हर खुशी का केंद्र हुआ करता था। यह रचना केवल छुट्टियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, अपनापन और पारिवारिक जुड़ाव की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती है।

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पुराने लकड़ी के संदूक में रखी बचपन की यादें, माँ की साड़ियाँ और भावनात्मक माहौल

एक नायाब संदूक

“एक नायाब संदूक” केवल एक कविता नहीं, बल्कि स्मृतियों का ऐसा कोमल संसार है, जहाँ बचपन की शरारतें, यौवन के सपने और माँ का स्नेह एक साथ सिमट आते हैं। इस कविता में संदूक एक प्रतीक बनकर उभरता है वह स्थान जहाँ जीवन के सबसे अनमोल क्षण सुरक्षित रहते हैं।

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गली में हाथ-ठेला लगाए कलई वाला, भट्टी के पास रखे पीतल के बर्तन और आसपास खड़े उत्सुक बच्चे

इतनी-सी खुशी!

“कलई करा लो…” की पुकार के साथ शुरू होती थी बचपन की हलचल। पीतल के बर्तनों की चमक, भट्टी की आँच और राँगे की खुशबू के बीच छिपी थीं मासूम खुशियाँ। यह संस्मरण केवल कलई की प्रक्रिया का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, पारिवारिक आत्मीयता और छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली अपार खुशी की झलक है। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में वे दिन याद बनकर मन को भिगो जाते हैं।

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माँ तेरा आँचल – हृदयस्पर्शी हिंदी कविता

माँ तेरा आँचल…

‘माँ तेरा आँचल’ कविता माँ के स्नेह, ममता और सुरक्षा के उस भावलोक को चित्रित करती है जहाँ आँचल ही संसार बन जाता है। यह रचना बचपन की स्मृतियों और मातृत्व की गरिमा को सरल शब्दों में जीवंत कर देती है।

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नानी के गाँव में चूल्हे पर रोटी बनाती दादी और नीम की छाँव में खेलते बच्चे

याद आता है पुराना जमाना

यह कविता बचपन की उन सरल और सच्ची यादों को जीवंत करती है, जब नानी का गाँव, चूल्हे की रोटी, नीम की छाँव, पाठशाला के संस्कार और बिजली जाने पर चिमनी की रोशनी जीवन का हिस्सा थे। “याद आता है पुराना जमाना” सिर्फ स्मृतियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस सादगी, अपनापन और संस्कारों की दुनिया की भावनात्मक पुनर्स्मृति है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं पीछे छूट गई है।

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सिगड़ी के पास सिमटी यादें

सिगड़ी की गर्माहट, मैया का स्नेह, ताई जी का अनुशासन और मम्मी की टोका-टाकी संयुक्त परिवार के वे दिन आज भी दिल को छू जाते हैं। यह संस्मरण बचपन, संस्कार और रिश्तों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर सीख स्नेह के साथ मिली।

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विदा के उस मोड़ पर खड़ी यादें

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद बादलों के पार एक जहान और भी है,यादों के दरमियान जो नहीं है, वह भी है.31 दिसंबर 2022 नानी नहीं रही यह मैसेज देखते ही हाथ-पाँव सुन्न हो गए. आँखों में आँसू आए और जम गए. होंठ फड़फड़ाए और खामोश हो गए. हालाँकि जानती थी, समझ भी रही थी, फिर…

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