यादों की गलियों में लौट चलें
माँ के हाथों का स्वाद केवल भोजन का स्वाद नहीं, बल्कि ममता, त्याग और निस्वार्थ प्रेम की ऐसी विरासत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे साथ चलती है।

माँ के हाथों का स्वाद केवल भोजन का स्वाद नहीं, बल्कि ममता, त्याग और निस्वार्थ प्रेम की ऐसी विरासत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे साथ चलती है।
सन् 1976 का रामगढ़ गांव, अम्मां का स्नेह, मिट्टी की खुशबू, लालटेन की रोशनी, चूड़ियों की छन-छन, दशहरे का मेला और बचपन की बेफिक्र दुनिया. यह संस्मरण उस समय की याद दिलाता है जब गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि रिश्तों, संस्कारों और अपनापन से भरी पूरी दुनिया हुआ करता था.
यह संस्मरण बचपन की उन सुनहरी यादों को जीवंत करता है, जहाँ बहन और सहेली का रिश्ता जीवनभर की सबसे बड़ी पूँजी बन जाता है। स्कूल, खेल, संयुक्त परिवार और निस्वार्थ मित्रता की यह कहानी हर पाठक को अपने बचपन की याद दिलाएगी।
कुछ दोस्त रिश्तों से नहीं, दिल से जुड़े होते हैं। श्याम सिंह और उनके दोस्त की 30 साल पुरानी दोस्ती बताती है कि सच्चा साथ समय और परिस्थितियों से कभी नहीं बदलता।
आधुनिक बिजली के पंखों और एसी के दौर में भी कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो मन को बरबस अतीत में ले जाती हैं। यह कविता “साटन का मोरा बीजना” पुराने समय के डोरी से चलने वाले झालरदार बीजने, घर-आँगन की आत्मीयता, संयुक्त परिवार की मधुरता और बचपन की सुकून भरी दोपहरों का मार्मिक चित्रण करती है।
जामुन की नीली जुबान, बचपन की मासूम खुशियां, आईने के सामने की शरारतें और सेहत से जुड़ी अनमोल बातें यह लेख जामुन के स्वाद, यादों और उसके औषधीय गुणों को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है।
शहर की भीड़ और ऊँची इमारतों के बीच खड़े होकर भी मन बार-बार उसी गांव की ओर लौट जाता है, जहाँ माटी की खुशबू, माँ के हाथों की गरमाहट और रिश्तों की सच्चाई आज भी दिल में ज़िंदा है।
“वो जो छुट्टियां थीं” एक भावनात्मक और नॉस्टेल्जिक लेख है, जो हमें सीधे बचपन की उन सुनहरी यादों में ले जाता है, जहाँ नानी का घर हर खुशी का केंद्र हुआ करता था। यह रचना केवल छुट्टियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, अपनापन और पारिवारिक जुड़ाव की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती है।