
वंदना शर्मा, नई दिल्ली
वो गलियां, वो चौबारा,
छोड़े हुए तो अरसा हुआ,
जुम्मा-जुम्मा आठ दिन,
पर ना जाने क्यों आज ऐसा लगा,
बरसों बीत गए।
उन गलियों से गुज़रे कभी,
बचपन बीता उन गलियों में,
उन फिजाओं में।
इतनी आसानी से कैसे
भुलाया जा सकता है
उन लम्हों को,
जिन्होंने मेरे आज का निर्माण किया,
मेरा व्यक्तित्व बनाया,
मुझे मुझसे मिलवाया।
कितनी खूबसूरत होती हैं यादें,
और कितना खूबसूरत लगता है अतीत।
पर इन यादों में खोकर
शायद मेरा ‘आज’ यूँ ही व्यर्थ हो गया,
तो आने वाले कल का निर्माण कैसे होगा?
कल जो बीत गया,
कल जो आने वाला है,
जो जोड़ता है दोनों को,
वो है ‘आज’।
यादों को अपनी हँसी बनाकर,
आज के संघर्ष से
आने वाले कल को सजाना है।
ये यादों का मौसम भी कितना दीवाना है।
लेखिका के बारे में-
डॉ. वंदना शर्मा
हिंदी साहित्य की संवेदनशील और बहुआयामी रचनाकार हैं। बिजनौर में जन्मी डॉ. शर्मा ने हिंदी में पीएचडी के साथ विज्ञान और मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। वे वर्तमान में आरबीडी पीजी कॉलेज, बिजनौर में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं।कविता, कहानी, यात्रा संस्मरण और समीक्षा उनकी प्रमुख लेखन विधाएँ हैं। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, जिनमें न्यूजीलैंड की ‘भारत दर्शन’ पत्रिका भी शामिल है। उनके दो काव्य संग्रह ‘एक अजीब दास्तां’ और ‘बस यूँ ही’ अमेज़न किंडल पर प्रकाशित हैं। ऑल इंडिया रेडियो से उनके काव्य पाठ का प्रसारण भी हो चुका है। साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ‘अर्धशती अलंकरण’ और ‘हिमाग्नि नव अंकुर साहित्यकार’ जैसे सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनका लेखन संवेदना, अनुभव और जीवन की सच्चाइयों का सहज प्रतिबिंब है।

यादों का मौसम कितना दीवाना
वाह बहुत बढ़िया लिखा 👌