ख़्वाब

टेबल पर खुली किताब, बिखरे कागज़ और खिड़की से आती रोशनी, अधूरे सपनों का भावनात्मक दृश्य

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर

कुछ ख़्वाब अधूरे से अच्छे लगते हैं,
अधूरी सी ख़्वाहिशें थीं जो
जीने की वजह थीं।
कुछ टूटे सपनों की कसक दिल में रहती थी,
अब अधूरा सा वो ख़्वाब किताबों में पलता है..!

कुछ ख़्वाब अधूरे से अच्छे लगते हैं,
बिखरे ख़्वाबों को चुनने में वक़्त तो लगता है।
शब्दों के धागों में पिरोया था हमने,
अब वो सारे ख़्वाब किताबों में बंधा है..!

कुछ अधूरे से ख़्वाब
जीने की वजह बनते हैं।
ज़रूरी नहीं कि सब कुछ मिल जाए यहाँ,
बेख़्याली में कुछ ख़्वाब देखा करते थे,
अब किताबों में तुम्हें देखते हैं..!

अब जो भी हो, जैसा भी हो “रीत”,
कुछ ख़्वाब अधूरे से अच्छे लगते हैं..!

4 thoughts on “ख़्वाब

  1. बहुत बढ़िया 👍 कुछ ख्वाब अधूरे अच्छे लगते हैं गजब लिखा है। बधाई आदरणीय 🙏

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