मोहन से महाकालः कृष्ण और नृसिंह

एक दिव्य दृश्य में एक ओर बाँसुरी बजाते भगवान कृष्ण और दूसरी ओर खंभे से प्रकट होते भगवान नृसिंह, प्रेम और शक्ति के दो रूप दर्शाते हुए।

डॉ.संगीता पांडे, पुणे

एक तरफ बाँसुरी की तान है,
दूजी भयंकर हुंकार है।
एक प्रेम का संगीत है,
दूजा अधर्म का संहार है।

श्री कृष्णः प्रेम का अवतार
वो नटखट नंदलाला, माखन चोर कहलाए,
गोपियों संग रास रचाए, सबका मन बहलाए।
मोरपंख शीश पर साजे, पीतांबर की शान,
उंगली पर गोवर्धन धरा, रखा सबका मान।
गीता का उपदेश दिया जब, अर्जुन थका खड़ा था,
प्रेम और कर्म का मार्ग, उन्हीं से बड़ा था।

भगवान नृसिंहः क्रोध और रक्षा
जब भक्त प्रहलाद को, अपनों ने ही सताया,
तब खंभा फाड़ कर, वो ‘नर-सिंह’ आया।
आधा शरीर मनुष्य का, आधी सिंह की काया,
हिरण्यकश्यप का अंत करने, क्रोध भयंकर छाया।
न दिन, न रात, न अस्त्र, न शस्त्र,
दहलीज पर क्रोध का हुआ प्रचंड ब्रह्मास्त्र।

एक ही ज्योति, दो रूप वही
कृष्ण हैं,
जो राधे संग, मधुर गीत गाते हैं।
वही नृसिंह बन कर, दुष्टों को मिटाते हैं।
एक ने प्रेम सिखाया, एक ने रिश्ता निभाया,
जब-जब धर्म पर आँच आई, उन्होंने ही बचाया।

सारः
चाहे प्रेम की हो बाँसुरी, या क्रोध की हो दहाड़,
प्रभु हर रूप में अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर हैं।


लेखिका के बारे में-

डॉ. संगीता पांडेय
समकालीन भारत की उन विरल प्रतिभाओं में से एक हैं, जिन्होंने विज्ञान, शिक्षा, साहित्य और अध्यात्म. चारों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित ‘विद्या वाचस्पति सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत डॉ. पांडेय एक समर्पित Biotechnologist, शोधकर्ता, शिक्षाविद् एवं संवेदनशील लेखिका हैं। बिहार के मोतिहारी से निकलकर उन्होंने अपने ज्ञान, अनुशासन और सतत परिश्रम के बल पर उपलब्धियों का प्रेरक आयाम रचा है।

एक वैज्ञानिक के रूप में उनकी दृष्टि तर्क, नवाचार और मानव कल्याण से प्रेरित है, वहीं एक शिक्षाविद् के रूप में वे नई पीढ़ी को आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय संस्कारों से जोड़ने का सतत प्रयास करती हैं। शिक्षा और प्रबंधन के क्षेत्र में उनका अनुभव उन्हें दूरदर्शी नेतृत्व प्रदान करता है। लेखिका के रूप में उनकी लेखनी में संवेदना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक गहराई का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में आधुनिक जीवन की चुनौतियाँ भी हैं और भारतीय संस्कृति की आत्मा भी। सरल, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी भाषा उनकी पहचान है। डॉ. संगीता पांडेय के व्यक्तित्व का एक अत्यंत मनोहर पक्ष उनकी भक्ति-साधना और मधुर गायकी है। उनके द्वारा गाया गया “जय राधा माधव” भजन उनकी कृष्ण-भक्ति, सांस्कृतिक चेतना और सुरीले अंतर्मन का साक्षात् प्रमाण है।
वे स्वयं कहती हैं- “मेरा जीवन प्रयोगशाला के परीक्षणों और मंदिर की प्रार्थनाओं के बीच का एक सुंदर संतुलन है। यदि बायोटेक्नोलॉजी मेरा कर्म है, तो श्री राधा-माधव की भक्ति मेरा विश्राम है।”

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