
दर्पण सोनी, महिदपुर रोड
तेरे वस्त्र विस्तार करते हुए,
आभा स्नान की यादें।
मुंडेर पर चली जाती हैं,
धूप लौटकर सुखाकर नम यादें।।
सूखे पुष्प में खुशबू है
और अभी तक नम हैं यादें।
पहरा मुश्क पर भी है
और पहरे में भी हैं यादें।।
पहरे में गुलाल होली की
और पहरे में रंगीन हैं यादें।
पहरे में बारिश में भीगना
और पहरे में हैं शुष्क यादें।।
पहरे में फूल का चुनना
और पहरे में हार के धागे।
बनाकर जिंदगी प्यारी
और पहरे में ढकीं यादें।।
मिटाकर खुद की हस्ती को,
दफन पहरे में वो वादे।
संभाला खुद को तुमने खुद से,
झुठलाकर सच्ची थीं जो यादें।।
बना है दर्पण किसके लिए
जो सामने नहीं है वो यादें।
छुपाकर रख न पाओगे,
जब बिखरेगी वो यादें।।

कृपाशीष