देह पर ठहरा मौसम !!

खिड़की के पास खड़ी सांवली भारतीय महिला, चेहरे पर शांति और प्रेम की अनुभूति, कंधों पर पड़ती हल्की धूप।

मीनाक्षी पारीक, जयपुर

मेरी सांवली देह के उस शांत भूभाग पर
जब तुम्हारे होंठों ने
पहली बार अपनी उपस्थिति लिखी,
तो लगा
जैसे किसी प्राचीन वाद्य में
सदियों से सोया हुआ स्वर
अचानक जागकर
अपने ही भीतर गूंजने लगा हो।

वह स्पर्श
न अधिक, न कम
बस उतना ही,
जितना किसी अधखुले आकाश में
धूप का पहला कण उतरता है,
और बिना शोर किए
धरती की नब्ज़ बदल देता है।

कंधों की ढलान पर
तुम्हारी सांस की महीन रेखाएँ
धीरे-धीरे खिंचती रहीं,
मानो कोई चित्रकार
अनदेखे रंगों से
एक अदृश्य चित्र रच रहा हो
जिसे केवल भीतर की आँखें देख सकती हैं।

उस क्षण,
रक्त केवल बहता नहीं था,
वह एक नई भाषा सीख रहा था
गर्माहट और नमी के बीच
कहीं ठहरी हुई एक अनकही बोली,
जो त्वचा से मन तक
बिना शब्दों के पहुँचती है।

रीढ़ की सीढ़ियों पर
तुम्हारी सांस
जैसे धूप की पतली लकीर बनकर उतरी,
और हर पायदान पर
जमी हुई थकान को
धीरे-धीरे पिघलाती चली गई।

पीठ के सन्नाटे में
जब वह स्पर्श ठहरा,
तो लगा
जैसे किसी शांत झील में
एक हल्की लहर उठी हो,
जो किनारों तक पहुँचकर
खुद को ही पहचानने लगे।

मेरी गर्दन
जो अब तक एक निर्जीव पत्थर-सी थी
तुम्हारे होंठों के स्पर्श से
अचानक जीवित शिल्प बन गई,
जिस पर उकेरी गई हर रेखा
समय से भी अधिक स्थायी थी।

और जब वह स्पर्श हट गया,
तो कोई कमी नहीं रह गई
बल्कि एक पूरा मौसम
मेरे भीतर से गुजर चुका था,
अपनी सारी हरियाली,
अपनी सारी ऊष्मा छोड़कर।

वह कंपन
पैरों से धरती तक उतरता हुआ
ऐसा था
जैसे कोई बेहद कोमल भूकंप
अंदर ही अंदर घटित हो,
जिसे बाहर की दुनिया
कभी दर्ज नहीं कर पाती।

अब भी
जब स्मृति के गलियारे में
वह क्षण लौटता है,
तो वह त्वचा पर नहीं,
मन के सबसे गहरे कक्ष में घटता है।

और हर बार,
जब तुम्हारे होंठ
उस जगह को छूने की कल्पना करते हैं
समय अपनी रफ्तार छोड़
एक पतले, पारदर्शी धागे पर
आकर ठहर जाता है…

जहाँ
देह नहीं,
केवल अनुभूति सांस लेती है


लेखिका के बारे में-
मीनाक्षी पारीक
समकालीन हिंदी और राजस्थानी साहित्य जगत की एक सशक्त, संवेदनशील और बहुआयामी रचनाकार हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज, संवेदना, संस्कृति और मानवीय रिश्तों को नई अभिव्यक्ति प्रदान की है। Jaipur की साहित्यिक भूमि से जुड़ी मीनाक्षी जी ने कविता, बाल साहित्य, पत्रकारिता और लोकभाषा लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी रचनाओं में जीवन का यथार्थ, स्त्री मन की सूक्ष्म अनुभूतियाँ, सामाजिक सरोकार और लोकसंस्कृति की मधुर गूँज सहज रूप से दिखाई देती है। एम.ए. (लोक प्रशासन) शिक्षित मीनाक्षी पारीक ने साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का सशक्त साधन बनाया है। उनकी लेखनी में जहाँ एक ओर भावनाओं की कोमलता है, वहीं दूसरी ओर विचारों की दृढ़ता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि भी है।
उनकी प्रकाशित कृतियों में “यथार्थ के झरोखे से”, “चाहत के मौन गलियारे”, “कूंत मिनखाजूण री”, “बंदर की बारात” तथा “मिनकी बोली म्याऊं” जैसी चर्चित पुस्तकें शामिल हैं, जिन्होंने पाठकों के बीच विशेष पहचान बनाई है। हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में उनकी सृजनशीलता उन्हें विशिष्ट बनाती है। साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु उन्हें देशभर की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। काव्य गौरव सम्मान, उत्कृष्ट लेखिका पत्रकार सम्मान, राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान, आखर युवा सम्मान, बाल साहित्यकार सम्मान तथा बाल साहित्य भूषण जैसे अनेक अलंकरण उनकी साहित्य साधना के प्रमाण हैं।

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