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मैं फिर जीत गई

अस्पताल के कमरे में आँसू भरी आँखों वाली भारतीय युवती बेहोश युवक का हाथ थामे खड़ी है, पास में चिंतित भाई खड़ा है।

विजया डालमिया, हैदराबाद

दूध औटाते-औटाते माया सोच रही थी कि जल्दी से यह काम कम्प्लीट हो जाए तो नई कहानी लिख डालूँ, क्योंकि कहानी की थीम उसके दिमाग में घूम रही थी। पर भाभी पीहर गई हुई थीं। इस वजह से घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ पड़ी थी। तभी फोन की घंटी बजी।

हैलो कहते ही दूसरी तरफ से आवाज आई-
“कहाँ हो तुम? कर क्या रही हो?”

“मिलिंद, मैं किचन में खीर के लिए दूध औटा रही हूँ।”

“अरे छोड़ो यार, कहाँ तुम दूध और किचन में उलझी पड़ी हो? वह सब छोड़कर हंसराज फंक्शन हॉल में तुरंत चली आओ।”

“मिलिंद, तुम्हें सब पता है। अभी भैया आते ही होंगे। उन्हें खाना भी…”

“हैलो माया… तुम चली आओ।”

“भैया, आप भी वहाँ मिलिंद के साथ हैं?”

“हाँ। अब जल्दी चली आओ।”

कहकर भैया ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। ओफ्फो… कहकर उसने गैस बंद की और तैयार होकर चल पड़ी।

ऑटो में बैठे-बैठे वह सोच रही थी कि किस तरह मिलिंद पहली बार भैया से टकराया था और तभी से भैया मिलिंद के फैन हो गए थे। जब पहली बार वह घर आया तो भाभी ने चुटकी काटी-
“लाडो रानी, तेरे भैया तो बड़े जिम्मेदार हो गए।”

पर ज्योंही भैया ने अपनी कविताएँ मिलिंद को सुनानी शुरू कीं, दोनों सब समझ गईं। उधर मिलिंद का जोर-जोर से “वाह-वाह” कहना दोनों को हँसाते चला गया। उन्हें पता ही नहीं चला कि कब मिलिंद उनके पीछे आकर खड़ा हो गया।

जैसे ही मिलिंद ने कहा—
“अगर हँसी से आप लोगों का पेट भर गया हो तो बचा खाना मुझ भूखे को खिला दीजिए।”

उसका यह अपनापन माया को बहुत अच्छा लगा। यह थी मिलिंद से पहली मुलाकात। उसके बाद धीरे-धीरे वह पहले उनके घर का, फिर उसके दिल का हिस्सा बनकर कब महकने और धड़कने लगा, उसे खुद नहीं पता चला।

उसकी खुशमिजाजी उनके घर में रौनक के रंग भर देती। मिलिंद एकदम अकेला था, यह उसे बहुत बाद में पता चला। हर बार बात होने पर यही कहता—
“भैया-भाभी के रहते मुझे कोई चिंता नहीं।”

बाद में समझ आया कि वह इस परिवार को ही अपना परिवार कह रहा था।

उसके कॉलेज से आने के बाद भैया यह कहते हुए उठकर चले जाते-
“लो आ गई हमें हराने वाली।”

और वह हँसते हुए मिलिंद के साथ कैरम या शतरंज खेलने बैठ जाती। जब भी वह जीतकर हँसती तो उसके गालों में जो गड्ढा पड़ता, वह मिलिंद को बहुत अच्छा लगता।

वह कहती—
“मैं फिर से जीत गई।”

और मिलिंद धीरे से कहता-
“तुम यूँ ही हमेशा जीतते रहो।”

कॉलेज से आने के बाद बचे समय में दोनों अपना वक्त एक साथ अच्छी चर्चा करते हुए बिताते। एक-दूसरे की प्रॉब्लम में दिल से साथ निभाते। जहाँ माया की समझदारी और गंभीरता का कोई जवाब नहीं था, वहीं मिलिंद की हाजिर-जवाबी और खुशमिजाजी का भी कोई सानी नहीं था।

अक्सर शाम ढले जब विचारों की महफिल जमती, तब भैया-भाभी तो खामोश रहते। मिलिंद और माया ही कहते रहते— कभी शब्दों में और कभी नि:शब्द होकर।

एक दिन जब माया बाहर से लौटी, तब मिलिंद किचन के प्लेटफॉर्म पर बैठा जोर से कुछ पढ़ रहा था-

व्यस्त उबाऊ क्षणों में खुशी का एक लम्हा हो तुम,
थके निराश जीवन में आशा की बैसाखी हो तुम,
बनावटी मुखौटों के बीच अपनेपन की पहचान हो तुम,
भावनाओं में निबद्ध शब्दों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति हो तुम,
रिश्तों की परिधि में ना होकर भी दिल के बेहद करीब हो तुम।

वह तुरंत दौड़कर आई और उससे अपनी डायरी छीनने लगी।

तब मिलिंद ने कहा-
“यह सब किसके लिए और कब से लिखा जा रहा है?”

माया ने हँसकर कहा-
“जब से कोई सच में दिल के करीब आ रहा है।”

उस दिन पहली बार उसने मिलिंद को गंभीर देखा।

मिलिंद ने कहा—
“माया, तुम बहुत अच्छा लिखती हो।”

माया ने कहा-
“अरे, मुझे लिखना नहीं आता। यह तो बस यूँ ही…”

पर मिलिंद ने कहा—
“नहीं, अब तुम्हें रोज लिखना होगा। मैं चाहता हूँ तुम्हारी डायरी एक किताब के रूप में सब तक पहुँचे।”

माया ने उसकी आँखों में देखकर कहा—
“जहाँ पहुँचनी थी, पहुँच चुकी।”

उसके बाद मिलिंद दिन-रात जब भी माया से मिलता, एक ही सवाल पूछता-
“आज क्या नया लिखा?”

और माया कहती—
“हाँ, कल जरूर लिखूँगी।”

पर वह मन ही मन सोचती थी कि मिलिंद के विचारों से मुक्त हो पाऊँ तो दूसरी तरफ सोच सकूँ। पर उसके रहते उसकी बातों में उलझी रहती हूँ और जाने के बाद खयालों में।

एकाएक मिलिंद का आना कम हो गया। माया बिखरने लगी। उसने भैया से पूछा-
“मिलिंद आजकल कहाँ बिजी है? दिखाई नहीं देता।”

तो भैया ने कहा—
“यही बात तो मैं तुझसे पूछने वाला था।”

तभी मिलिंद आया और हाथ पकड़कर कहने लगा—
“माया, कल एक साहित्य गोष्ठी है, जहाँ तुम्हें अपनी एक रचना पढ़नी है।”

माया ने कहा-
“मुझे यह सब नहीं करना।”

“पर मैं तुम्हारा नाम दे चुका हूँ।”

“मुझसे बिना पूछे?”

“तुम्हें पूछने की क्या जरूरत है?”

“क्यों? क्यों नहीं है जरूरत?”

कहकर जब माया ने शिकायती नजरों से मिलिंद को देखा तो उसने नजरें घुमाकर कहा-
“दो मिनट में तैयार होकर मेरे साथ चलो।”

वह माया को अपने साथ मंदिर में ले गया और कहने लगा-
“तुम्हें पता है, आज मैं भगवान के सामने यह बात दिल से कबूल कर रहा हूँ कि मैं हमेशा यूँ ही तुमसे हारते रहना चाहता हूँ।”

“क्या मतलब?”

“मतलब यही, बुद्धू, कि तुम हमेशा जीतो। बहुत ऊँचाइयों तक पहुँचो। मेरी जिंदगी में तो कोई लक्ष्य था ही नहीं। अब तुम्हें आगे तक लेकर जाना ही मेरा लक्ष्य है और मैं जानता हूँ कि तुम फिर से जीत जाओगी।”

सच में… उसके बाद से माया की कलम चल पड़ी। मिलिंद के प्रयासों से माया का नाम एक अच्छे साहित्यकार के रूप में उभरकर आया। उसकी कहानियों ने एक अलग पहचान बनाई।

उस पहली काव्य गोष्ठी में उसकी रचना ही सबसे ज्यादा पसंद की गई। तालियों की गड़गड़ाहट में जब उसने मिलिंद की ओर देखा तो वह अपने आँसू पोंछ रहा था।

कुछ दिनों से मिलिंद बहुत परेशान दिख रहा था। माया के पूछने पर उसने कहा-
“अरे कुछ नहीं… यूँ ही… बस तुम्हें अवॉर्ड दिलाना है ना… मेहनत तो करनी पड़ेगी।”

“अब यह कौन-सा अवॉर्ड है जो तुम मुझे दिलाना चाहते हो? मुझे जो मिलना था, मिल चुका मिलिंद।”

पर मिलिंद कब हार मानने वाला था? बात जब माया की जीत की हो, तो मिलिंद भले ही हार जाए… पर माया कभी हारे, तो उसके लिए मिलिंद को जिद करके भी जीत जाना पसंद था।

कल से माया की बाई आँख बहुत फड़क रही थी। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।

तभी भैया कहने लगे-
“माया, जल्दी चलो मेरे साथ।”

“कहाँ चलना है भैया?”

“अरे तू चल तो।”

कहकर भैया उसे अपने साथ ले गए।

“हॉस्पिटल? यहाँ हम किसे देखने आए हैं भैया?”

जैसे ही माया ने पूछा, भैया उसे एक रूम में ले गए। माया का दिल तेजी से धड़कने लगा। हाथों में जैसे जान ही न हो।

उसने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने मिलिंद बेसुध पड़ा था।

उसने डॉक्टर से पूछा—
“डॉक्टर, यह सब…”

डॉक्टर ने कहा-
“कुछ समझ में नहीं आ रहा। यह अचानक ही कैसे बेहोश हो गए। अभी और जाँच बाकी है।”

माया एकटक मिलिंद को देखे जा रही थी। अचानक उसे न जाने क्या हुआ, उसने आगे जाकर मिलिंद के माथे को सहलाना शुरू कर दिया।

वह बार-बार बुदबुदाने लगी—
“मिलिंद, मुझे फिर से जीतना है… तुम्हें हराना है।”

कहते-कहते उसके आँसू मिलिंद के माथे पर गिरने लगे और तभी मिलिंद के बदन में कुछ हरकत हुई।

“डॉक्टर… इन्हें होश आ रहा है।”

“अरे, यह तो चमत्कार हो गया। दो दिन से हम कोशिश कर रहे थे, पर मैडम, आपने तो कमाल कर दिया।”

और माया भैया के सीने से लिपटकर रोते हुए कह पड़ी—

“मैं फिर से जीत गई, भैया…”

4 thoughts on “मैं फिर जीत गई

  1. भावुक कर दिया आपने विजया जी बहुत बढ़िया 👌

  2. बहुत सादगीपूर्ण और संवेदनशील वर्णन
    बहुत अच्छा लिखा

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