अनिलकुमार कांठेड़, प्रसिद्ध कपड़ा व्यवसायी महिदपुर रोड
कहते हैं कि जीवन में धन, पद और प्रतिष्ठा फिर से प्राप्त की जा सकती है, लेकिन एक सच्चा मित्र यदि बिछड़ जाए, तो उसकी कमी कभी पूरी नहीं होती। कुछ रिश्ते समय के साथ खत्म नहीं होते, बल्कि हर गुजरते दिन के साथ और अधिक गहरे होते जाते हैं। मित्रता भी ऐसा ही एक रिश्ता है, जो खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि विश्वास, आत्मीयता और निस्वार्थ प्रेम से बनता है।
फ्रेंडशिप डे का अवसर आते ही मन अनायास ही अपने प्रिय मित्र, शहर के प्रसिद्ध बर्तन व्यवसायी, धर्मपरायण और अत्यंत सरल व्यक्तित्व के धनी स्वर्गीय फकीरचंदजी कसेरा की यादों में खो जाता है। आज भी उनका मुस्कुराता चेहरा, स्नेह से भरी बातें और हर मुलाकात का अपनापन आंखों के सामने जीवंत हो उठता है। ऐसा लगता है जैसे वे कहीं गए ही नहीं, बस थोड़ी देर के लिए नजरों से ओझल हुए हैं।
सामाजिक और राजनीतिक जीवन के लंबे सफर में मुझे उनके साथ बहुत समय बिताने का सौभाग्य मिला। कितनी ही बैठकों, यात्राओं, सामाजिक कार्यक्रमों और निजी चर्चाओं के अनगिनत पल आज भी स्मृतियों में उसी तरह सुरक्षित हैं। वे जब भी मिलते, चेहरे पर वही सहज मुस्कान होती और पहला सवाल हमेशा दूसरों की कुशलक्षेम का होता। अपने बारे में वे बहुत कम बोलते थे, लेकिन सामने वाले का दुख सुनने के लिए उनके पास हमेशा समय होता था।
फकीरचंदजी का स्वभाव जितना मिलनसार था, उतना ही सीमित उनका मित्रों का दायरा था। उनके सच्चे मित्रों में मैं, नारायणसिंहजी चौहान और रफीक सर शामिल थे। हम घंटों साथ बैठते, समाज की बातें करते, भविष्य की योजनाएं बनाते और कभी-कभी बिना किसी विषय के भी देर तक बातचीत करते रहते। उन बैठकों में न कोई औपचारिकता होती थी, न कोई स्वार्थ। केवल अपनापन, विश्वास और आत्मीयता होती थी। आज जब उन दिनों को याद करता हूं, तो लगता है कि जीवन के सबसे खूबसूरत पल वही थे।
वे केवल सफल व्यवसायी नहीं थे, बल्कि एक ऐसे इंसान थे, जो हर व्यक्ति के सुख-दुःख को अपना समझते थे। किसी को सहायता की आवश्यकता हो, किसी परिवार पर संकट आया हो या किसी सामाजिक कार्य में सहयोग देना हो, वे हमेशा सबसे पहले खड़े दिखाई देते थे। उन्होंने मित्रता को केवल निभाया नहीं, बल्कि अपने जीवन से उसे अर्थ दिया।
आज भी जब कभी किसी पुराने स्थान से गुजरता हूं, किसी परिचित चेहरे से मिलता हूं या कोई पुरानी बात याद आती है, तो अनायास ही उनकी याद दिल को छू जाती है। कई बार मन करता है कि एक बार फिर उनके साथ बैठकर चाय पी जाए, पुराने दिनों की बातें हों और उनकी वही आत्मीय मुस्कान फिर से देखने को मिले। लेकिन नियति के आगे किसी का बस नहीं चलता। कुछ लोग इस दुनिया से चले जाते हैं, पर अपनी यादों से कभी नहीं जाते।
फ्रेंडशिप डे पर उनकी अनुपस्थिति पहले से अधिक महसूस होती है। यह विश्वास करना आज भी कठिन लगता है कि वे हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने बहुत जल्दी इस संसार को अलविदा कह दिया, लेकिन अपने पीछे ऐसी स्मृतियां छोड़ गए, जो जीवनभर हमारा साथ देंगी। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि स्वर्गीय फकीरचंदजी कसेरा की पुण्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। उनकी सादगी, संवेदनशीलता, मित्रता और मानवीय मूल्यों की विरासत हम सभी को सदैव प्रेरित करती रहे।
अंत में बस इतना ही…
“सच्चे मित्र कभी बिछड़ते नहीं, वे समय से परे जाकर हमारी यादों, हमारी प्रार्थनाओं और हमारी धड़कनों में हमेशा जीवित रहते हैं।”
