कुछ दोस्त जाते नहीं… बस दिखाई देना छोड़ देते हैं

फ्रेंडशिप डे पर दो दिवंगत मित्रों की याद में भावनात्मक लेख, सच्ची दोस्ती और यादों को समर्पित चित्र।

नरेंद्र कुमार अरोरा (पंजाबी), बिजनेसमैन तथा संस्थापक, ब्राइट स्टार एकेडमी महिदपुर रोड

फ्रेंडशिप डे हर साल आता है. लोग प्रोफाइल तस्वीरें बदलते हैं, पुराने फोटो तलाशते हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएँ भेजते हैं. लेकिन कुछ दोस्त ऐसे होते हैं, जिन्हें याद करने के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं पड़ती. वे हर दिन याद आते हैं. कभी किसी मोड़ पर, कभी किसी खामोशी में, तो कभी किसी अधूरी बात के बहाने.
आज सुबह चाय का पहला घूंट लिया तो अनायास लगा, जैसे पारस मेरे सामने बैठा कह देगा, तू इतनी चिंता मत किया कर… हर मुश्किल का कोई न कोई रास्ता होता है.अगले ही पल सच ने धीरे से कंधे पर हाथ रखा.अब वह सामने नहीं बैठता. थोड़ी देर बाद किसी विषय पर राय लेने का मन हुआ तो सहज ही ख्याल आया. डॉक्टर साहब से पूछ लेते हैं.लेकिन अगले ही क्षण याद आया कि अब उनके जवाब शब्दों में नहीं, स्मृतियों में मिलते हैं. ज़िंदगी भी अजीब किताब है. कुछ लोग उसमें कहानी बनकर आते हैं, तो कुछ पूरी किताब की खुशबू बन जाते हैं.
मेरे लिए पारस बोथरा ऐसी ही खुशबू थे. समाज, राजनीति और परिवार हर क्षेत्र में उनकी सक्रियता और समर्पण प्रेरणादायक था. वे मुश्किलों से घबराते नहीं थे, उनका सामना करते थे. उनके पास हर समस्या का कोई न कोई समाधान होता था. उन्होंने मुझे सिखाया कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, हिम्मत का दरवाज़ा कभी बंद नहीं करना चाहिए. उनसे हर छोटी-बड़ी बात साझा करने के बाद मन हल्का हो जाता था.

डॉ. रामगोपाल गुप्ता का व्यक्तित्व भी उतना ही आत्मीय था. उनकी बातें कभी शोर नहीं करती थीं, लेकिन देर तक मन में गूँजती रहती थीं. हमारा कार्यक्षेत्र अलग-अलग था, फिर भी हमारी सोच, हमारे संस्कार और इंसानियत के प्रति हमारा विश्वास हमें एक सूत्र में बाँधे रखता था. मैं, पारस और डॉ. गुप्ताजब भी साथ बैठते, समय जैसे ठहर जाता था. समाज, परिवार, जीवन, भविष्य और अनुभवहर विषय पर घंटों चर्चा होती. कब शाम रात में बदल जाती, पता ही नहीं चलता. आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि सच्ची दोस्ती घड़ी की सुइयों से नहीं चलती. उसमें समय नहीं बीतता, बल्कि यादें बनती हैं.

हमारी दोस्ती का सफर लगभग चालीस वर्षों का रहा. इन चार दशकों में न जाने कितनी यात्राएँ साथ कीं, कितनी चाय की प्यालियाँ साझा कीं, कितनी हँसी बाँटी और कितने कठिन फैसलों में एक-दूसरे का हाथ थामा. मित्रता कब पारिवारिक रिश्ते में बदल गई, इसका एहसास ही नहीं हुआ. आज भी जब कोई अच्छी खबर मिलती है, तो मन सबसे पहले उन्हीं तक दौड़ता है. फिर अचानक याद आता है कि जिन नंबरों पर कभी घंटों बातें होती थीं, वहाँ अब सिर्फ खामोशी है. समय ने मुझे एक बात सिखाई हैलोग चले जाते हैं, लेकिन उनकी आवाज़ें नहीं जातीं. वे किसी सलाह में मिल जाती हैं, किसी आदत में बस जाती हैं, किसी मुस्कान में लौट आती हैं और कभी किसी अकेली शाम में चुपचाप पास आकर बैठ जाती हैं.पारस, तुम्हारी हिम्मत आज भी मेरे फैसलों का हिस्सा है.
डॉक्टर साहब, आपकी सादगी और आत्मीयता आज भी मेरे शब्दों में साँस लेती है. तुम दोनों कहीं गए नहीं हो… बस आँखों से ओझल हो गए हो. दिल की अलमारी में तुम्हारे लिए आज भी एक कोना वैसा ही सुरक्षित है, जहाँ समय की धूल नहीं जमती. फ्रेंडशिप डे पर लोग अपने दोस्तों के साथ तस्वीरें साझा करते हैं.
मैं आज अपनी ज़िंदगी के उन दो अनमोल साथियों को याद कर रहा हूँ, जिन्होंने दोस्ती का अर्थ केवल साथ निभाना नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाना सिखाया. कहते हैं, दोस्ती की कोई उम्र नहीं होती. शायद इसलिए कुछ दोस्त कभी बिछुड़ते नहीं. वे हमारी यादों की धड़कनों में बस जाते हैं. और जब भी ज़िंदगी बहुत थका देती है, वे चुपचाप आकर कंधे पर हाथ रख देते हैं…
बस… दिखाई नहीं देते.

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