कैफे हाउस …

झील किनारे कैफ़े में दो कप चाय के साथ बैठी महिला, अपने मित्र की यादों में खोई हुई, सच्ची दोस्ती पर आधारित भावनात्मक हिंदी कहानी।

विजया डालमिया, हैदराबाद

शांत झील और उसके किनारे “मिलन कैफे हाउस” जहां आकर किसी का जाने का मन ना करे ।यहीं तो मिली थी वह पहली बार कृष से। तब से आज तक दोनों इसी वक्त यहीं मिलते रहे। आज झील की शांति उसे बेचैन कर रही थी। पूरा एक महीना हो गया उसे कृष से मिले हुए।रोज की तरह वह चाय के दो कप लेकर बैठ गई। एक कप उसके हाथ में था और दूसरा कप सामने रखा था। वही कप उससे बातें करने लगा…

.. “कैसी हो”?..

..”क्या रोज-रोज यही पूछते हो! तुम्हें नहीं पता ,मैं कैसी हूं”… ?

..”अरे कह दो ना, अच्छी हूं”..।

..”हां वो तो हूं ही! तुम कहो, क्या लिख रहे हो आजकल”..?

..” अरे यार, आज लिखूं तो कल छूट जाता है और कल लिखूं तो आज दूर चला जाता है”..।

..”यार तुम जो भी लिखो सच लिखो! यही तो तुम्हारी पहचान है। तुम्हारे अपने अनुभव तुम्हारी शान है। उन्हें उतारो पन्नों पर”…।

..” सच यार तुम्हारी जैसी दोस्त कहीं नहीं, जो चुटकियों में हर उलझन सुलझा देती है”.. ।

….”ओए, तुम्हें मुझसे प्यार तो नहीं हो गया”…?

.. नहीं, कभी नहीं ,क्योंकि कुछ रिश्ते प्यार से भी ऊपर होते हैं! ऐसा ही रिश्ता है मेरा तुम्हारा”…।

..”देखो कृष तुम्हारी बातें मुझे इमोशनल कर देती है”..।

..” पता है कुकू, कभी-कभी बहुत मन करता है… तुम्हें गले लगाने का… तुम्हारी गोद में सर रखकर सोने का.. किंतु कहीं तुम….”

..” क्या कहीं तुम “…?

..”कुछ नहीं”… कहकर कृष कुछ गुनगुनाने लगा।

इधर कोकिला ने मन ही मन में कहा…” मैं जानती हूं कृष तुम मुझे बहुत पसंद करते हो, किंतु मैं अपनी मर्यादा भी समझती हूं। हम दोस्त बन रहें ,वही ठीक है”…।

कृष युवा पत्रकार था जो हर घटना की सच्चाई दुनिया तक पहुंचाना अपना धर्म मानता था। मैं यानी… “कोकिला” एक कवयित्री थी, जो हर घटना के पीछे छुपे मनुष्य के दर्द ,प्रेम और संवेदना को शब्द देती थी।
कृष अक्सर उससे पूछता…
” तुम्हारी स्याही में इतने आंसू क्यों है”..?

वो कहती..” तुम्हारा आंसुओं से क्या लेना देना..?

वो हंसकर कहता …”आंसुओं में बहकर सच नहीं लिखा जाता मैडम”…! तुम्हारे शब्द सुंदर है, लेकिन सच्चाई कम है”…।

वो कहती…”आपकी खबरों में सच्चाई तो है, पर थोड़ी संवेदना कम है”…!

दोनों एक दूसरे की आलोचना कर एक दूसरे को निखारते रहे। एक की कलम तथ्य लिखती ,दूसरी कलम मन की धड़कन। कृष ने कोकिला से संवेदनशील होना सीखा और कोकिला ने कृष से निर्भीक होकर सच कहना। अचानक कृष का तबादला हो गया। जाते-जाते उसने कहा…
” जब कविता ज्यादा ही भावनाओं में बहने लगे तो उसे सच के किनारे पर ले आना”…।

…”और जब सच लिखते लिखते शब्द थक जाए तो उसे मेरे पास भेज देना”…!

दोनों जानते थे कि वो अपनी कविताओं में उसे लिखती है और हर सच में वह उसे तलाशता है। यही उनकी सच्ची दोस्ती थी कि वह एक दूसरे की संवेदनाओं में जीते थे ताकि एक जैसे ना होते हुए भी एक दूसरे को पूर्ण कर सकें।

तभी अचानक एक आवाज…” अरे तुम्हारी चाय ठंडी हो गई”…! नजर उठाए बगैर ही
आंखों में आई हुई नमी को छुपा कर खुशी से कांपती हुई आवाज में उसने कहा…

” कोई बात नहीं ! इतने दिनों से रोज ठंडी ही चाय पी रही हूं”…।

बिना स्पर्श किए एक आवाज ,एक मुस्कान, एक नजर और एक शब्द सब कुछ बदल देता है… यह उसे महसूस हुआ। उस एक आवाज ने उसके टूटे हुए हिस्से को सहला दिया और बातों में चाय के साथ संवेदना की गर्माहट फिर से घुलने लगी।

कृष ने उस दिन जाकर एक खबर लिखी कि… एक कप चाय आपको सम्मानित कर सकती है। मेरी सबसे अच्छी दोस्त वो है जो शब्द नहीं बदलती …अपनी संवेदनाओं से नजर बदल देती है।

और कोकिला ने अपनी डायरी में लिखा… मेरे सबसे अच्छे मित्र तुम हो, जो सच से कभी समझौता नहीं करते। इसीलिए मेरी कविताओं में आज भी उम्मीद जिंदा है।

स्त्री और पुरुष की हर आत्मीयता प्रेम नहीं होती। कुछ रिश्ते शब्दों से दोस्ती करके भी निभाए जाते हैं।

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