अधूरी दोस्ती

तीन दोस्तों की यादों को दर्शाता भावनात्मक दृश्य, एक महिला अकेली बैठी पुरानी दोस्ती को याद करती हुई।

डाॅ. क्षमा सिसोदिया


ख़ुशी और दोस्ती ऐसी अनमोल दौलत है ,जो बहुत कम लोगो को मिलती है। ऐसी ही दोस्ती थी हम तीनों की ।
  “आकाश की असीमता और मिट्टी के सोंधेपन में, फूलो की सुंदरता और इंद्रधनुष के सतरंगी रंगो में रंगी हुई।
हमारी ऐसी पक्की दोस्ती थी,जो पौष की ठिठुरन लिए शरद पवन की मधुर छुहन सी वसंत की मादकता में ‘प्रेम-दिवस’ के इस प्रेम भरे रंग में आज के दिन वर्षों पुरानी दोस्ती न चाहते हुए भी बरबस याद आ  ही जाती है।साथ ही एक टीस भी लाती है कि-“क्या दोस्ती इसी को कहते हैं ?”
शुचिता को अपनी दोस्ती पर नाज था। पति के जाने के बाद यही दोनों तो थे,जिनके साथ वक्त गुजारकर वह सुकून से भर जाती थी।कहीं घूमने जाना हो तो साथ, मंजूला कुछ भी अच्छा बनाती तो फोन करके घर बुला लेती और शुचिता अपने दोनों बच्चों के साथ वहाँ  घंटों बिताती और  बेफिक्री से  बैठकर मयंक के साथ फैक्टरी और पति की बातें दिल खोलकर करती।कहीं भी जाना हो,तीनों साथ जाते।शुचिता को अपनी इस दोस्ती पर बहुत नाज था।उसे लगता था कि उसकी सुनी दुनिया में कोई कोना तो ऐसा है,जहाँ वो अपने बच्चों के साथ सुकून से बैठ सकती है। उसने कभी स्वप्न में भी यह नही सोचा था कि उसे लेकर पति का दोस्त मयंक जो अब उसका बहुत ही अच्छा दोस्त बन गया था कुछ और सोच रहा होगा,उसके मन में कुछ और ही पल रहा होगा। जबकि ‘मयंक’ को शुचिता का स्वाभाव भी खूब अच्छे से पता था ।वह खुद ही बोलता था कि-“अगर मैं गलती से भी तुम्हारे कंधे पर हाथ रख दूँ,तो तुम मुझसे बात करना बंद कर दोगी । “
     फिर भी उसने “वैलेन्टाइन-डे” को  कहीं बाहर चलकर काफी पीने का आग्रह किया। यह सुनकर शुचिता को अटपटा तो लगा लेकिन वो चुप रही,कुछ सेकेंड चुप रहने के बाद उसने जवाब दिया-“ठीक है,फिर साथ में ‘मंजूला’ को भी साथ लेकर चलो।” यह सुनते ही ‘मयंक’ चिढ़ गया और वर्षों पुरानी गहरी दोस्ती एक झटके में टूट गयी ।
   इस बात को जब शुचिता ने अपनी प्रिय सखी मंजूला को बताई तो वह एक भारतीय पत्नी की तरह इस सच को मानने के इंकार कर दी और ठक से बोली-“तुम्हें कोई ग़लतफ़हमी हुई है।”उसके मुँह से ऐसा सुनकर शुचिता हक्की-बक्की सी उसे देखती रह गयी।
   जबकि  सच्चाई क्या है, यह उसे बहुत अच्छी तरह से पता था।उसे पता था कि मैं सच बोल रही हूँ और इसमें मुझे कोई ग़लतफ़हमी नहीं हुई है। “क्योंकि  प्रेम की भाषा तो भावनाओं की भाषा होती है, जज्बातों की भाषा होती है और उसकी प्यारी सखी शुचिता इन सब बातों से बहुत दूरी बनाकर रखती है।” किसी एक की गलती की वजह से इतना अच्छा और पक्का रिश्ता टूट गया था और आज तीनों ही अपने अधूरे सच के साथ अलग हो चुके हैं और छोड़ गये थे दोस्ती के नाम पर एक अधूरा प्रश्न…?
इस बात को बीते हुए काफ़ी समय हो गया लेकिन जब भी ‘वैलेंटाइन-डे’ आता है,अपनी अधूरी दोस्ती याद आकर ह्रदय में एक अजीब सी टीस भर देती है।


लेखिका के बारे में-

डॉ. क्षमा सिसोदिया

डॉ. क्षमा सिसोदिया हिंदी साहित्य की एक प्रतिष्ठित रचनाकार हैं, जिन्होंने कविता, लघुकथा, हाइकु, बाल साहित्य और व्यंग्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। शिक्षा और साहित्य के प्रति समर्पित डॉ. सिसोदिया की लेखनी में जीवन के अनुभव, मानवीय संवेदनाएँ और सामाजिक सरोकार सहज रूप से अभिव्यक्त होते हैं।उनकी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ‘केवल तुम्हारे लिए’, ‘कथा सीपिका’, ‘भीतर कोई बंद है’, ‘यशोधरा’, ‘बावरा मन’ और ‘बटुआ’ प्रमुख हैं। उनकी रचनाएँ विभिन्न भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनूदित होकर व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँची हैं। अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित डॉ. क्षमा सिसोदिया आज भी निरंतर साहित्य साधना में सक्रिय हैं। उनकी लेखनी संवेदना, सृजन और समाज के प्रति प्रतिबद्धता की जीवंत अभिव्यक्ति है।

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