
ममता सिंह देवा
तीनों बच्चे पार्क से खेलकर, पसीने से तर-बतर आए। उन्हें देख राजेश्वरी ने प्यार से अपने से चिपकाकर कहा, “जल्दी से जाकर बड़े वाले बाथरूम में नहा के आओ, नाश्ता तैयार है।”
बच्चे चले गए। राजेश्वरी अपने बेडरूम और बच्चों की स्टडी के बीच में खड़ी सोच रही थी कि वो किस कमरे में जाए… अपने बेडरूम में? जिसमें न जाने कितनी बार संबंधों का विष अपने पति को उनकी चचेरी भतीजी को देते देखा है।
तीन बच्चों के बाद पति का मन भर गया तो देवरों के मन में विष भर गया। बात-बात में “मेरी भाभी, मेरी भाभी” कहकर गोद में उठाने वाले देवरों के सर्पदंश से वो घायल होने लगी, लेकिन कहे तो किससे कहे?
ससुर जाने-माने दबंग… मुहल्ले के ज़्यादातर लोग उनके पैसे के रुआब से दबे रहते या उनकी दबंगई से डरकर दूरी बनाए रखते थे।
किसी भी चीज़ की कमी नहीं थी परिवार में। प्यार करने वाली सास-ननदें और बहुत छोटे दो देवर, गाड़ी, हवेली नुमा घर, नौकर-चाकर—सब कुछ तो था।
राजेश्वरी को देख कोई कह नहीं सकता था कि ये इतना विष पी रही है… सबके सामने चेहरे पर वही मुस्कान।
त्योहार में पहुँच जाओ तो रसोईघर में सजी-धजी छप्पन भोग बनाती नज़र आती। कोई भी देखकर कह नहीं सकता था कि विवाह के दस साल हो गए हैं, लगता था जैसे डोली से उतारकर सीधे रसोईघर में ही गृहप्रवेश किया गया है। मज़ाल जो राजेश्वरी बिना खाना खाए जाने दे। पकवानों से भरी थाली सजाकर बड़े मनुहार से खिलाती।
दिनभर सजी-धजी रहकर सबकी आँखों को धोखा देती। वो अच्छे से जानती थी रात में दोनों देवरों में से कब कौन-सा देवर शरीर के साथ उसकी आत्मा से कपड़े उतार देगा।
बच्चे नहाकर तौलिया लपेटे हुए “मम्मी-मम्मी” कहते हुए ऊपर आए, तो मम्मी नहीं दिखी। बच्चे रसोईघर में भागे, मम्मी वहाँ भी नहीं। अपने बेडरूम में भी नहीं। बच्चे स्टडी की तरफ गए तो स्टडी अंदर से बंद थी।
दो बच्चे तो छोटे थे, लेकिन बड़ा बेटा नौ साल का था। उसने खिड़की के शीशे में से पंखे से कुछ लटकती हुई चीज़ देख ली थी।
दरवाज़ा थोड़ा गया। राजेश्वरी को उतारा गया। शरीर गर्म था, चेहरा वैसा ही जैसे उसे अभी डोली से उतारा गया हो। कुछ लिखकर गई थी कि नहीं गई थी या ससुर और देवरों ने दबा दिया था… रसूखदार ससुर का रसूख काम आया। कह दिया गया कि दिमागी परेशानी थी।
पति का दूसरा विवाह दुनिया को दिखाने के लिए ये कहकर कर दिया गया कि बच्चों का क्या होगा, कौन देखेगा?
धीरे-धीरे परिवार तबाह होने लगा। उनका रुतबा लोगों की नज़र में गिर गया। जिन बेटों के लिए हवेली बनवाई थी, सब आपस में लड़-झगड़कर हवेली छोड़कर चले गए।
ससुर जिस शान से मुहल्ले में टहलते थे, कम पैसे वालों का मज़ाक उड़ाते थे, वो अपने कमरे तक सीमित रह गए। सास-ननदें रोती रहतीं, लेकिन राजेश्वरी के यूँ जाने का कारण जान नहीं पाईं। बच्चे हॉस्टल चले गए। ये उनके भविष्य के लिए बहुत अच्छा हुआ।
जिस परिवार के लिए राजेश्वरी ने अपना सर्वस्व गंवा दिया, एक उफ़ तक नहीं की, लेकिन बिन बोले उसकी आह ने उस परिवार को तबाह कर दिया।
राजेश्वरी अपने भरसक अंदर ही अंदर विष पचाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वो इंसान थी। संबंधों का अमृत होता तो पान कर लेती, संबंधों का विष था. वमन तो होना ही था।
“न कॉल, न मैसेज, न कोई वजह… आखिर क्यों रिश्तों में बढ़ रहा है घोस्टिंग का चलन ?”
फ्रेंडशिप डे
दोस्त
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वो तीन दिन
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कॉफी कनेक्शन
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