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रूहानी चाहत

रूहानी प्रेम कहानी में एक युवक और युवती के बीच खामोश भावनाएं
vijya dalmiya

विजया डालमिया, हैदराबाद

पहली बार मैंने उसे तब देखा, जब तेज़ी से लूना चलाते हुए वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रही थी—

“हटो… हटो… हटो…!”

और अचानक मुझसे टकरा गई।

“अरे… रे… रे…” करते हुए वह गिर पड़ी।

उठते ही बोली—

“अंधे हो? दिखाई नहीं देता? मैं सामने से आ रही थी। रास्ता देना चाहिए था ना!”

मैं अचरज से उसे देखता रह गया।

खुद की गलती के लिए भी मुझे कसूरवार ठहरा रही थी।

मैंने कहा—

“पर मैं तो…”

उसने तुरंत आँखें तरेरकर कहा—

“हाँ… हाँ… जानती हूँ। यही कहोगे ना—तुम्हारी गलती है। तो ठीक है ना! जब कोई नया-नया सीख रहा होता है तो यही होता है। पर सामने वाला तो संभाल सकता है ना?”

मैं उसकी मासूमियत पर अंदर ही अंदर मुस्कुरा उठा।

“जी मैडम।”

लेकिन उसने सुना ही नहीं।

“देख क्या रहे हो? अभी भी मुझे ही कहना पड़ेगा क्या कि लूना उठाने में मेरी मदद करो?”

मैंने तुरंत अपनी साइकिल छोड़ी और कहा—

“तुम हटो। मैं अकेला ही काफ़ी हूँ।”

वह तपाक से बोली—

“वही तो! मुझे पता है, तुम अकेले ही काफ़ी हो।”

मैंने पूछा—

“कहाँ रहती हो?”

उसने आँखों ही आँखों में सवाल किया—क्यों?

मैंने कहा—

“अरे, लूना लेकर तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ दूँ।”

वह खुश हो गई।

“पास ही कॉर्नर पर मेरा घर है। तुम्हें पता है, यह लूना मेरी नहीं है।”

“अच्छा! तो फिर किसकी है?”

“एक फ्रेंड की। माँगकर लाई थी।”

“ओह… तो अब?”

“अब क्या? वापस दे दूँगी।”

उसकी स्पष्टवादिता मुझे पसंद आई।

मैंने उसे गौर से देखा। लंबी-लंबी दो चोटियाँ करीने से गुँथी हुई थीं। बड़ी-बड़ी आँखों में हल्का-सा काजल। लेमन येलो रंग का सलवार-सूट, जिस पर चिकन वर्क बेहद खूबसूरत लग रहा था। एक हाथ में घड़ी, दूसरे में एक चूड़ी। कानों में छोटे-छोटे बुंदे, जो बात करते वक़्त हिलने लगते।

मैं उसे इतने ध्यान से देख रहा था और वह हर राह चलते से बतियाने में मस्त थी।

मुझे पहली बार लगा—

शायद इस मोहल्ले में मैं किसी को जानता ही नहीं था…

और यह एक लड़की थी, जो जैसे पूरे मोहल्ले को अपना मानती थी।

उसे घर छोड़कर मैं अपने कमरे पर आ गया।

वह लड़की कई बार मुझे याद आ जाती।

फिर एक दिन अचानक सब्ज़ी मंडी में वही जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई दी—

“अरे अम्मा! आपकी सब्ज़ियों का थैला तो बहुत भारी हो गया है। आपका निखट्टू बेटा नहीं आया ना आज भी? चलिए, मैं ले चलती हूँ।”

तभी उसकी नज़र मुझ पर पड़ी।

दूर से ही हाथ हिलाकर मुझे बुलाया और बोली—

“आप इन्हें इनके घर तक छोड़ दीजिए।”

मैंने ताज्जुब से उसे देखा।

दूसरी मुलाक़ात और इतना अधिकार?

पर मुझे अच्छा लगा।

मैंने थैला उठाया और कहा—

“चलो अम्मा।”

रास्ते में अम्मा बोलीं—

“भगवान इसे सदा खुश रखे।”

मैंने पूछा—

“अम्मा, यह लड़की आपकी…?”

अम्मा मुस्कुरा दीं।

“अरे, यह मेरी कुछ नहीं होते हुए भी सब कुछ है। और मेरी ही नहीं बेटा, यह सबकी बहुत कुछ है। हर ज़रूरतमंद की मदद करना जैसे इसके खून में ही है। बहुत भली और नेक है। यही वजह है कि मोहल्ले में सब इसे बेहद चाहते हैं। पर यह अपनी सेवाओं के बदले किसी से कुछ नहीं चाहती।”

मैंने पूछा—

“और इसका परिवार?”

अम्मा चौंक पड़ीं।

“शायद तुम नए आए हो। यह मोहल्ला ही इसका परिवार है।”

अम्मा को छोड़कर घर आया तो एक पल के लिए भी उस लड़की को भूल नहीं पाया।

वह मेरे ज़ेहन पर छाने लगी थी।

वह मेरी कुछ नहीं होते हुए भी…

बहुत कुछ बन गई थी।

फिर गाहे-बगाहे हम आपस में टकराते रहे। बातों-बातों में पता चला कि वह वकील बनना चाहती है। मैंने उसका हौसला बढ़ाया और लॉ की पढ़ाई के लिए जो भी औपचारिकताएँ थीं, पूरी कर उसका दाखिला लॉ कॉलेज में करवा दिया।

उसकी मेहनत और लगन रंग लाई।

मोहल्ले वालों की दुआएँ उसके साथ थीं ही।

जल्दी ही लॉ की डिग्री लेकर वह मेरे सामने खड़ी थी।

मेरे लिए वह सुनहरा पल आँखों में आँसू ले आया।

उसके सम्मान में पूरे मोहल्ले वालों ने पार्टी रखी।

उस रात वह मेरे पास आई और धीरे से मेरे कानों में कहा—

“Thank you… and love you.”

गुलाबी ड्रेस में उसका चेहरा भी गुलाबी हो गया था।

मैं उसे देखता रह गया।

उसने धीरे से पूछा—

“मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?”

मैं हँस पड़ा—

“नहीं… पर तुम्हारे साथ तुम्हारा इतना बड़ा परिवार मैं कैसे संभालूँगा?”

वह मुझसे लिपट गई और बोली—

“बदमाश!”

वह पल…

वह लम्हा…

मुझे एक नया विश्वास दे गया।

मोहल्ले वालों ने हम दोनों की आँखों में एक-दूसरे के प्रति चाहत को पढ़ लिया था—जो अब प्रेम बन चुकी थी।

समय देखकर एक दिन अम्मा ने पूछा—

“बेटा, कब तक यूँ ही अकेले-अकेले रहोगे?”

तो हम दोनों के मुँह से एक साथ निकला—

“अकेले कहाँ अम्मा? हम तो साथ-साथ हैं।”

वक़्त गुजरता गया।

उसका नाम अब नामी-गिरामी वकीलों में होने लगा। उसके शब्दों की सरलता और सच्चाई लोगों के दिल को छू जाती थी। यही वजह थी कि हर केस में उसे कामयाबी मिलती चली गई।

बिना किसी रिश्ते के हमारे पवित्र प्रेम की खुशबू हमें महकाती रही।

वह कितनी भी व्यस्त क्यों न हो, कुछ समय हम साथ ज़रूर बिताते। उसका मेरे लिए समय निकालना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।

क्योंकि अब उसका कद मुझसे बहुत ऊँचा हो गया था।

पर उसे इसका भान तक नहीं था।

न ही कभी उसने मुझे ऐसा महसूस कराया।

वह तो आज भी मेरे लिए वही लूना से गिरने वाली बिंदास लड़की थी।

फिर एक दिन…

वह रोज़ की तरह लौटी, लेकिन इस बार उसके साथ एक लड़का था।

मैं चौंक गया।

उसने हमारा परिचय कराया और कहा—

“यह विनय है। इनका केस मैं ही लड़ रही हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि यह बेगुनाह हैं।”

मैंने उसे गौर से देखा।

“अच्छा! तुम कहती हो तो ज़रूर ये बेकसूर ही होंगे।”

फिर मैंने कहा—

“अच्छा, तुम बातें करो इनसे। मैं थोड़ी देर में आता हूँ।”

और वहाँ से निकल गया।

दूसरे दिन से उसके व्यवहार में मेरे प्रति बदलाव आने लगा।

मेरे पूछने पर उसने सूनी आँखों से मुझे देखा और कहा—

“कुछ नहीं।”

पर हम तो एक-दूसरे की ख़ामोशी भी पढ़ लिया करते थे।

मैंने वह सुन लिया…

जो उसने कहा ही नहीं था।

उस दिन के बाद उसने केस लेने बंद कर दिए।

और मैं अपनी ही नज़रों में गिर गया।

क्योंकि मैं उसका गुनहगार था।

वह लड़का कोई और नहीं, मेरा परिचित ही था।

वह मेरे उस जुर्म की सज़ा काट रहा था, जो मैंने किया ही नहीं था।

लेकिन घटनास्थल पर मेरा मौजूद होना ही मुझे गुनहगार बना गया था।

वह लड़का मुझे जानता था। इसलिए उसने सारे आरोप अपने ऊपर लेकर मुझे बरी कर दिया।

जब मैंने रचना के साथ उसे देखा था, तभी मुझे रचना को सब कुछ बता देना चाहिए था।

लेकिन मैंने सोचा—

दूसरे दिन समय देखकर आराम से सब बता दूँगा।

बस…

यहीं मैं चूक गया।

कभी-कभी वक़्त हमें अपनी सफ़ाई देने का वक़्त ही नहीं देता।

फिर से एक बार मैं गुनहगार हो गया।

इस बार गलती मेरी थी—

उसका भरोसा तोड़ने की।

कितने ही “काश” मेरी ज़ुबान पर आ गए।

काश… मैंने तभी उसे सच बता दिया होता, जब वह उस लड़के को लेकर आई थी।

काश…

काश वह मुझे भी अपनी सफ़ाई में कहने का एक मौका देती।

उसके मौन ने मुझे तोड़कर रख दिया।

वह तेज़-तर्रार लड़की…

वह सच्ची लड़की…

कहीं खो गई।

उसने केस लेने बंद कर दिए।

मेरे पूछने पर उसने सिर्फ़ इतना कहा—

“मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा केस… मैं हार गई।”

मैं सब समझ गया।

कहते हैं, नारी जब टूटती है तो उसकी पीड़ा दिखाई दे जाती है।

लेकिन जब पुरुष टूटता है, तो कई बार आवाज़ तक नहीं होती।

उसके दर्द को समझ पाना मुश्किल होता है।

कभी-कभी वह खुद भी नहीं समझ पाता कि उसके भीतर क्या-क्या टूट रहा है।

धीरे-धीरे उसका पूरा अस्तित्व जैसे खत्म होने लगता है।

संवेदना और सहजता—ये शब्द कभी-कभी परिस्थितियाँ बन जाते हैं।

और उन्हीं परिस्थितियों में कोई ऐसी घटना घट जाती है, जिसे दुनिया सिर्फ़ “झूठ” का नाम दे देती है।

जिस तरह एक माँ अपने भूखे बच्चे को खिलाने के लिए खुद भूखी रहकर कह देती है—

“हाँ, मैंने खा लिया।”

तो क्या वह झूठ होता है?

नहीं ना?

उसी तरह प्रेम में भी कभी-कभी इंसान सच छिपाता नहीं,

बल्कि उस रिश्ते को खोने के डर से शब्दों को रोक लेता है, जिसे खो देने के बाद उसके लिए जीना ही मुश्किल हो जाता है।

गलती प्रेम में भी हो सकती है।

लेकिन हर गलती बेवफ़ाई नहीं होती।

कभी-कभी एक अधूरा सच,

पूरी ज़िंदगी का अपराध बन जाता है।

और कभी एक “काश”

पूरी ज़िंदगी की सज़ा।

पर…

चाहत मेरी कहानी नहीं, रूहानी है।

झूठ मेरा झूठ नहीं, ये कहती आँखों की रवानी है।

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