
कृष्ण कुमार गुप्ता (पुणे)
चौदह वर्षों का वनवास भोगकर लौटे अवध नरेश,
अयोध्या ने तब पलकें बिछा घी के दीप थे जलाए।
मिटा अधर्म का काला साया, सुधरे सारे क्लेश थे,
त्रेतायुग से आज तक देशवासी ये पर्व मनाते आए।
बचपन की वह धमाचौकड़ी, माँ के हाथों की मिठाई,
मिट्टी के वो जलते दीपक कई यादों को हैं जगाते।
आँगन में सजी रंगीन रंगोली, आँखों में यादें तैरतीं,
दीपक दूर बैठे अपनों की सुध-बुध हमको हैं दिलाते।
गरीब कुम्हार के सूने नयना राह तकते ग्राहक की,
असली दिवाली तो तभी है, जब वह भूखा न सोए।
चलो खरीदें दीप उसी से, आस बँधाएँ उस मन को,
अँधियारी बस्ती के कोने में एक भी बच्चा न रोए।
घर को सजाकर रखें, पर मन के कोने भी चमकाएँ,
एक दीपक विश्वास का जला दें हर टूटे अरमान में।
नफ़रत, ईर्ष्या और द्वेष को दिलों से दूर भगाकर,
खुशियाँ बिखेर दें चारों ओर हम सब पूरे जहान में।
हर चौखट पर मुस्कान खिले, ऐसा हो यह पर्व महान,
स्नेह के घी में प्रेम की बाती, करुणा का प्रकाश बहे।
दिलों से दिलों को जोड़ दे, दीपावली की यह पहचान,
जगमग हो जाए जग सारा, सुख की मंद बयार बहे।
शुभ-लाभ और शुचिता का घर-घर में हो जाए वास,
मंगलकारी, कल्याणकारी हो दीपक की ज्योति महान।
दिवाली के शाश्वत भाव में है प्रभु पर अटूट विश्वास,
दिलों में भर जाएँ उजाले और जग जाए आत्मज्ञान।
श्रीराम का जीवन कहता, यही धीरज कभी न खोना,
सत्य और न्याय की खातिर कष्टों को हमेशा सहना।
जीत हमेशा सत्य की होगी, संकटों में न रोना कभी,
यह त्योहार सिखाए हम सबको मर्यादा में ही रहना।
जलना खुद पड़ता है पहले, जग को उजाला देने में,
कटुता, द्वेष और नफ़रत छोड़ प्रेम का दीप जलाओ।
त्याग और सेवा के भाव से अपने मन को भरकर,
दीपावली के पावन पर्व को सब मिल-जुलकर मनाओ।
