gulmohar

बरात दिए की

अंधेरे में एक साथ जलते हुए मिट्टी के दीपक। एक दीप जलता है तो रोशनी का सिलसिला आगे बढ़ता है।

मनोहरसिंह चौहान मधुकर

बरात दिए की जब आएगी,
घर-घर खुशियाँ भर जाएगी।

बस दीप जलाकर छोड़ दे,
रोशनी स्वमेव जग जाएगी।

कुछ छोड़ भी औरों के लिए,
व्यवस्था सारी जुट जाएगी।

तू लकीर मन से खींच दे,
देखना दूर तक जाएगी।

मत सोच कहाँ, कौन क्या है,
हस्ती तुझको समझ जाएगी।

हटकर चल ज़रा दुनिया से,
एक अलग छवि बन जाएगी।

दूर रहा कर बेअक्ल से,
शोहरत तुझे समझ जाएगी।

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