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दिल को छूती मौन की गूँज…

“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”

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“अस्तित्व”

“दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों की राहों में भी, छोटे-छोटे क्षण और यादें हमारे अस्तित्व को जीने का साहस और संबल देती हैं। गुप्तधन जैसे नन्हा दीपक, उड़ते पंछी, यादों की कुप्पी—ये सब हमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अपने अस्तित्व के साथ जुड़ने का अनुभव कराते हैं।

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