gulmohar

मेरा सामान

खामोशी, बचपन की यादों और एहसासों को समेटती एक स्त्री कुछ सामान वस्तुओं के नहीं, मन में सहेजे एहसासों के होते हैं।

सुमिता नारवाल, जयपुर (राजस्थान)

मैं जुटा लेती हूँ अपने जैसे सामान,
कुछ खामोशी, कुछ बिखरे अल्फ़ाज़।
रखती हूँ उन्हें अपने ही ढंग से
टेबल, अलमारी, पलंग पर।
फिर देखती हूँ उनमें
जीते एहसास, छिपी आवाज़।

मैं जुटा लेती हूँ अपने जैसे सामान,
गुम हुई मासूमियत, खनकता बचपन।
संभालती हूँ उन्हें अपने ही अंदाज़ से
कविता, चित्रकारी में।
फिर देखती हूँ उनमें
पलते सपने, तेज़ होती परवाज़।

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