भाषा की सीमाओं से परे भारतीय संस्कृति और साहित्य का अनूठा संगम

दिव्या सक्सेना, पीएचडी शोधार्थी, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर (म.प्र)
उर्दू में रामकथा की साहित्यिक उपस्थिति जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने की दिशा में इसकी भूमिका है। इस पुस्तक में उर्दू के रचनाकारों द्वारा महाकाव्य के विभिन्न पात्रों, चरित्रों, आदर्शों तथा विविध प्रसंगों को अपनी भाषिक संवेदना, साहित्यिक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक चित्रण के माध्यम से धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका अध्ययन इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में हमारे सामने आता है कि रामकथा की बहुभाषिक यात्रा केवल भाषा या साहित्यिक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संवाद, संवेदना और सृजन के माध्यम से सांस्कृतिक समन्वय को भी निरंतर विस्तृत करती है।
‘उर्दू में रामकथा’ के माध्यम से लेखक उस समन्वयकारी चेतना को उद्घाटित करता है, जिसमें विविध सांस्कृतिक परंपराएँ एक-दूसरे से संवाद करती हैं। घटनाओं और पात्रों के माध्यम से मानवीय मूल्यों के अनुशीलन के साथ-साथ भारतीय साहित्यिक विरासत की बहुलतावादी प्रकृति तथा सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की परंपरा को समझाने की सार्थक पहल इस पुस्तक में दिखाई देती है।
भारतीय संस्कृति की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में उसकी बहुलता, सहिष्णुता और समन्वयशीलता शामिल हैं। यहाँ विविध भाषाओं, धर्म-कर्म, आस्थाओं और जीवन-दर्शनों ने परस्पर संवाद करते हुए एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का निर्माण किया है, जिसका आधार मानवीय संवेदना, नैतिक चेतना, सत्य और सह-अस्तित्व की भावना है।
उर्दू में रामकथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस में रची-बसी वह सांस्कृतिक धरोहर है, जिसने विभिन्न भाषाओं और साहित्यिक विधाओं, चाहे वे गद्य हों या पद्य, में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। यही व्यापकता इसे किसी एक भाषा, समुदाय अथवा सांस्कृतिक परंपरा की सीमाओं से परे ले जाती है तथा समय और समाज के साथ नए अर्थ गढ़ते हुए विविधता में भी समन्वय स्थापित करती है।
भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के साथ-साथ विश्व की अनेक भाषाओं में रामकथा का वर्णन मिलता है। यह संग्रह वैचारिक और साहित्यिक विशेषताओं के साथ-साथ अपने भीतर सांस्कृतिक विरासत को भी समेटे हुए है। जहाँ तक उर्दू भाषा की बात है, इसमें रामकथा अत्यंत मधुर एवं मनोहर रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होती है। इस पुस्तक में उर्दू और फ़ारसी भाषा के लगभग 150 रचनाकारों तथा 20 कवियों के माध्यम से रामकथा के रसास्वादन का अवसर मिलता है। अनुवाद के क्षेत्र में भी यह एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।
डॉ. श्री अजय मालवीय द्वारा संकलित ‘उर्दू में रामकथा’ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें रामकथा की पूर्णता सीता के बिना अधूरी है। तालिब इलाहाबादी ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है-
“जब चिता रौशन हुई, हैरत से सब देखा किए।
उसमें दाखिल हो गई सीता निहायत शान से।।
ले लिया शोलों ने उनको अपना आँचल खोल के।”
अनूप चंद ‘आफ़ताब’ पानीपती ने शबरी के बेर के प्रसंग में लिखा है-
“इक प्रेम है जिस चीज़ पे क़ायम हुई दुनिया,
इक प्रेम है भगवान भी जिस पर हुए शैदा।
यह बेर है इनके मोहब्बत का भरा है,
और लुत्फ़ मोहब्बत का ज़माने से जुदा है।”
गोपीनाथ ‘अमन’ लखनवी के शब्दों में-
“हो गए क़िस्मत के क़ायल वह जो थे,
बन के काहिल बैठे हैं, लेते हैं तेरा नाम देख।”
इन पंक्तियों में ‘ऐ राम देख’ की अभिव्यक्ति अपने आप में कितना व्यापक चित्रण प्रस्तुत करती है।
‘उर्दू में रामकथा’ अपनी आलौकिक काव्यात्मक शैली, रोचक प्रसंगों, संवादात्मक ग़ज़लों और भाषाई चित्रणों के माध्यम से हमारे सामने एक व्यापक शोधपरक दृष्टि भी प्रस्तुत करती है। इसमें संवेदनाओं की प्रखरता और भाषाई रोचकता भरपूर मौजूद है।
ताहिर बानो की इन पंक्तियों में नारी अस्मिता के भाव किस तरह उभरकर सामने आते हैं, इसे देखिए-
“देखी थी ग़म ज़माने के, चुपचाप सह गई।
महलों को छोड़-छाड़ के जंगल में रह गई।।
वह मुल्क सरफ़राज़ हो सीता जहाँ पे हो।
वह बज़्म बज़्म-ए-नाज़ है, सीता जहाँ पे हो।।”
यदि हम इस पुस्तक को और गहराई से देखें तो यह नई संभावनाओं के द्वार खोलती है। भाषा, देश के नायक और शायर के माध्यम से यह तमाम संकीर्णताओं को तोड़ते हुए सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने में सक्षम दिखाई देती है।
इस संदर्भ में फ़िराक़ गोरखपुरी की इन पंक्तियों पर ‘वाह-वाह’ करने के लिए भी हम बाध्य हो जाते हैं-
“यह हल्के-हल्के सोने साँवलेपन का समाँ।
ज़मुना जल और आसमानों में कहाँ।।
सीता के स्वयंवर में पड़ा राम का अक्स।
या चाँद से मुखड़े पर है ज़ुल्फ़ों का धुआँ।।”
इस प्रकार यह पुस्तक तमाम शायरों की अभिव्यक्तियों का ऐसा नायाब संकलन है, जो सामाजिक एकता और साहित्यिक एकरूपता के बीच सुंदर एवं सहज संबंध प्रस्तुत करता है। रामकथा के विभिन्न चरित्रों का वर्णन ग़ज़ल, दोहे आदि के माध्यम से तथा पात्रों के बीच रोचक संवादों के उल्लेख द्वारा किया गया है। यह पुस्तक मानवीय भावों को बड़े प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करने में सक्षम है।
कहते हैं कि ज्ञान के सागर में डूबकर ही ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति प्राप्त होती है। मुंशी राम सहाय ‘तमन्ना’ लखनवी की पंक्तियों में इसे देखिए-
“राम का नाम है आराम का देने वाला।
ध्यान का, ज्ञान का, धन-धान का देने वाला।।
दास ‘तमन्ना’ शरण तुम्हारी, सीता जी के प्यारे हो तुम।
इस जोड़ी पर तन-मन वारूँ,
सीताराम हमारे हो तुम।।”
प्रस्तुत संग्रह ‘उर्दू में रामकथा’ विभिन्न पांडुलिपियों का भी संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करता है, जो अलग-अलग संस्थानों से प्राप्त हुई हैं। इसके साथ ही इसमें साहित्य की विभिन्न विधाओं का समावेश है। गद्य में उपन्यास, नाटक और कहानियाँ हों अथवा पद्य में ग़ज़लें, रुबाइयाँ और दोहे, सभी में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की कथा का सुंदर वर्णन मिलता है। साहित्यिक दृष्टिकोण से यह पुस्तक उर्दू में रामकथा के विविध आयामों को सामने लाने में सफल रही है।
एक ही पुस्तक में इतनी विविधता का समावेश इस कृति को साहित्यिक और भाषाई दृष्टिकोण से विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। इसके साथ ही यह उर्दू में रचित रामकथा की परंपरा को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी प्रस्तुत करती है। रामकथा के अनुरागियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए इसका अध्ययन अत्यंत उपयोगी है। विश्व रामायण कोश के संदर्भ में भी इसकी उपयोगिता महत्वपूर्ण हो सकती है।
अंत में मीला राम ‘वफ़ा’ की इन पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा-
“ज़ेबा है जितना फ़ख़्र करें सरज़मीने हिंद।
हिस्सा फ़क़त इसी का विलादत है राम की।।
ऐसा कोई हरीफ़-ए-सआदत न हो सका।
तारीख़ में नज़ीर-ए-शहादत है राम की।।
जी चाहता है उनके क़दम चूम लीजिए।
जिनके दिलों पे नक़्श-ए-इरादत है राम की।।”
