आज़माए को आज़माते हो
“यार, धोखे पे धोखा खाते हो” एक मार्मिक हिंदी-उर्दू ग़ज़ल है, जो रिश्तों में मिले धोखे, अधूरी उम्मीदों और दिल की पीड़ा को बेहद संवेदनशील अंदाज़ में व्यक्त करती है। हर शेर इंसानी रिश्तों की बदलती सच्चाइयों, तन्हाई और बेवफाई के दर्द को उकेरता है। सरल लेकिन असरदार भाषा में लिखी गई यह ग़ज़ल पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है और लंबे समय तक मन में अपनी छाप छोड़ती है।
