
अनुपमा भार्गव
अंधेरे की उजालों से
अदावत पुरानी है,
ये कोई नई बात नहीं,
पुरानी कहानी है।
अस्ताचलगामी सूर्य जब
पश्चिम में ढलता है,
दीपक के कंधे पर
निज दायित्व धरता है।
जब अंधकार नन्हें दिए को
आँखें दिखाता है,
दीपक घबराता नहीं,
टिमटिमाती रोशनी से
वह मुस्कुराता है।
हौसला उसका तम की सेना पर
पड़ता भारी है,
इसीलिए दीपक जलाना
संस्कृति हमारी है।
आइए, एक अनोखा दीपोत्सव
हम मनाते हैं,
मन के अँधेरे कोनों को
जगमगाते हैं।
एक दिया उस कोने में,
जहाँ लालच का अँधेरा है,
एक वहाँ, जहाँ कुंठा और
निराशा ने घेरा है।
एक नेह से भरा दिया
निज अंतर्मन में रख लें,
ये जीवन पाए सार्थकता,
काम कुछ ऐसा कर लें।
दीपक के उजियारे से
प्रकाशित कर लें अपना मन,
दूर करें मन का अँधियारा,
