
डॉ. मंजूलता, नोएडा
चार दिनों से लगातार मूसलाधार बारिश हो रही थी। रुकने का नाम नहीं ले रही थी। झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाके में जलभराव के कारण मुश्किल हो रही थी। इसके सदस्य अपने-अपने काम पर भी नहीं जा पा रहे थे। अधिकतर इनमें रोज कमाने-खाने वाले थे। चार-पाँच दिनों से वे काम पर नहीं जा पा रहे थे, इसलिए पैसों की भी दिक्कत होने लगी थी। खाना जुटाना भी मुश्किल हो रहा था।
उधर कच्चे घर, जिनकी छतें फूस और पुआल से निर्मित थीं, लगातार चू रही थीं। रमा बाई के घर की स्थिति बहुत ही खराब थी। तीन वर्ष पहले उसने छत की मरम्मत कराई थी, जो अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुकी थी। जिसे फिर से छवाने की जरूरत थी। किंतु पैसे के अभाव में रमा बाई ठीक नहीं करा पा रही थी। अक्सर उसका बेटा रामू पूछ बैठता—
“माँ, छत को ठीक कराती क्यों नहीं हो?”
माँ—”बेटा, पैसे नहीं हैं। जब होंगे, तब करा दूँगी।”
बेटा—”क्यों माँ, तू तो रोज मजूरी करने जाती है न। ठेकेदार बाबू पैसे नहीं देते?”
माँ—”देते हैं बेटा, कुछ काटकर। फिर तेरे बापू की बीमारी में जो कर्जा लिया था, उसका सूद भी भरना होता है बेटा। थोड़ा-बहुत जो बचता है, उससे ही खाना-खर्ची चलाती हूँ। क्या करूँ? किसे दोष दूँ? आज तेरा बापू जिंदा होता तो कष्ट थोड़ा कम होता। समझ बेटा।”
बेटा—”पर माँ, मैं क्या करूँ? देख न, रात में जो बारिश हो रही थी, उसमें मेरी पूरी कमीज भीग गई। रोज ही ऐसे हो रहा है। मैं भीगे कपड़े में ही सो जाता हूँ।”
माँ—”तू मेरे पास क्यों नहीं आया? मैं अपने सीने से चिपका लेती, फिर तुझे ठंड भी नहीं लगती। तू भीगता भी नहीं।”
रामू—”तू भी कौन-सी पूरी की पूरी सूखी होती हो?”
बेटा—”अच्छा माँ! तूने तो कहा था नया कुर्ता देगी। दिया नहीं।”
माँ—”पैसे बचते नहीं बेटा। बचेंगे तो बनवा दूँगी।”
बेटा—”तो मैं क्या पहनूँ? एक तो भीगी, दूसरे जगह-जगह से फट गई है।”
माँ—”कुछ दिन और सह ले बेटा। कभी तो भगवान की आँख खुलेगी। ऐसा कर, तुम्हारे बापू के मरने पर मैंने एक कुर्ता निशानी के लिए छुपाकर रख लिया था। वह भी मैला हुआ है। जा, वही पहन ले। इसे सूखने के लिए दे दूँगी।”
बेटा गया और असगनी पर से उतारकर पहन लिया। आठ साल का बच्चा उस कुर्ते में डूब गया। चिल्लाया-
“माँ, ये देखो! ये तो मेरे पैर तक आ रहा है। मैं तो इसमें डूब गया। कैसे चलूँगा?”
माँ—”चुपचाप घर में खटिया पर बैठ। पुराना वाला सूख जाएगा, तब दे दूँगी।”
माँ ने बेटे को कह तो दिया, लेकिन कोने में जाकर रोने लगी। वह अंदर से गरीबी सहते-सहते टूट चुकी थी।
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