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प्रतीक्षा

वर्षों की प्रतीक्षा और विरह में डूबी स्त्री को दर्शाती हिंदी कविता जब प्रतीक्षा थक जाती है, तब प्रेम से जवाब नहीं, कभी-कभी विदाई माँगी जाती है।

मौसमी चंद्रा की पुस्तक इश्क है कि जादू-टोना से

मौसमी चंद्रा, पटना

जो मेरे अधरों पर
सूखे जल-स्रोत सी
जमी रही
वर्षों तक!

तुम्हारे किसी एक स्पर्श से
जलधारा बनकर लौटने की
प्रतीक्षा!

परीक्षाओं की असीम पुकार
रोज़ नए रूप में
मुझे परखती रही…

मानो मैं
तुम्हारे संशयों का
अनवरत धधकता यज्ञकुंड हूँ,
जिसमें डालनी होती है
अपने ही विश्वास की आहुति!

अब थक रही हूँ मैं!
यह थकान मेरे रक्त में उतर चुकी है!

मेरी हड्डियों में,
स्नायुओं तक
भर गई है
एक भारी चुप्पी!

हताशा की यह दीर्घ छाया
एक गहरी काई का
रूप ले चुकी है!

सुनो, मेरे प्रिय!

यदि तुम्हारी पलकों पर
अब भी मेरा नाम
पल भर को काँपता है…

तो मुझे
वह नाम लौटा दो!

या…

विदा कर दो मुझे!

जैसे बारिश
विदा लेती है
सूखी मिट्टी से,
अपना बोझ छोड़कर…
अकेली ही!

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