
निधि सिंह
इस दुनिया में मनुष्य की हैं दो क़ौमें
स्त्री और पुरुष।
दो विरोधी क़ौमें,
मगर सहजीवन को अभिशप्त।
दोनों की दुनिया,
दो विरोधी दुनिया।
एक में शांति है,
व्यवस्था है,
प्रकृति है;
दूसरे में अशांति,
अव्यवस्था और कृत्रिमता।
पहला उजड्ड, गंदला और दुर्वासित;
दूसरा संस्कृत, शिष्ट और सुवासित।
एक शोषक,
दूसरा शोषित,
एक शिकारी,
दूसरा शिकार।
शेष सब भ्रांतियाँ हैं,
शिकार-शिकारी तक पहुँचने के पूर्व की पीठिका।
धार्मिक दंगे हों,
परिणाम होगा—
स्त्रियों का बलात्कार।
भगदड़ हो,
दबोची जाएँगी स्त्रियाँ।
पारिवारिक झगड़े हों,
निशाने पर होंगी स्त्रियाँ।
गालियों से जिसके देह को विछिन्न करने की
अश्लील मंशा खुलेआम प्रकट की जाएगी,
वह होंगी स्त्रियाँ।
राजनीतिक रंज हो,
बलि पर चढ़ाई जाएँगी स्त्रियाँ।
नक्सली दमन हो,
जिसकी योनि में पत्थर ठूँसा जाएगा,
वह होंगी स्त्रियाँ।
रास्ते में जिसका देह नोचा जाएगा,
वह होंगी स्त्रियाँ।
जिसकी देह को जाने कैसी-कैसी वीभत्सता से
चीरा जाएगा,
वह होंगी स्त्रियाँ।
सामाजिक विवाद हो,
निशाने पर चढ़ेंगी स्त्रियाँ।
पिता की नाक के लिए
जीवन कुर्बान करेंगी स्त्रियाँ।
विवाह के बाद पति की हिंसा सहेंगी स्त्रियाँ,
उसकी देह को उधेड़ा जाएगा
तो चुप रहकर सहेंगी स्त्रियाँ।
पढ़ने जाएँगी तो रास्ते या हॉस्टल में
बलात्कार और छेड़छाड़ से डरेंगी स्त्रियाँ।
शिक्षक से डरेंगी,
सहपाठी से डरेंगी।
दफ़्तर में बॉस के निशाने पर रहेंगी स्त्रियाँ,
प्रमोशन में सहयोगी के ताने पर रहेंगी स्त्रियाँ।
हर जगह काउच की तरह
बरती जाएँगी स्त्रियाँ।
बड़े-बड़े राजनयिकों, उद्योगपतियों,
बौद्धिकों, राजकुमारों की
घृणित और वीभत्स लालसाओं की
भेंट चढ़ेंगी स्त्रियाँ।
ज़िंदा जलाई जाएँगी स्त्रियाँ,
पकाकर खाई जाएँगी स्त्रियाँ।
उनकी देह पर
गोश्त परोसा जाएगा।
ये हैं स्त्रियाँ!

स्त्री, मानव देह; जो न हो तो संसार मानव विहीन हो जाये, शायद ये बात अभी तक स्त्री को पता नहीं है और यदि जिस दिन उसे ये आभास हो गया तो अंत निश्चित है परन्तु हिन्दू समाज ने इसे पंगु बनाकर रखा है, हम ही नहीं चाहते स्त्री आगे बढ़े और पुरुष ने अपने अनैतिक लालच मे इसका जीवन के हर मोड़ पर दमन किया है