
संध्या यादव, मुंबई
सुनो जान…
लोग कहते हैं,
थके शरीर को नींद पत्थर पर भी आ जाती है
और ऐसी ही गाढ़ी कमाई वाली नींद को
मिलते हैं सपने…
लोग ये भी कहते हैं कि
सुबह के सपने सच होते हैं।
मुझे नींद तो नहीं आई,
मगर अक्सर झपकी लगी।
ट्रेन में हैंडल पकड़े,
एक पैर पर खड़ी थी-
जब दूसरे हाथ की उँगलियों के
नाखून के कोने में लगे आटे को
अनदेखा कर रही थी…
या फिर ट्रेन की चौथी सीट पर बैठी
गर्दन ज़रा-सी लुढ़की ही थी कि
बगल वाली ने अपने कंधे को
ज़ोर से उचकाया…
गरदन में लटकी चुन्नी
किसी और के बैग से लिपटकर
मेरे लिए फाँसी का फंदा भी बन सकती थी…
कभी पैरों का बिना नाखून वाला अँगूठा
किसी की सैंडल से घायल हो गया था…
बस,
उसके कुछ सेकेंड पहले ही…
हर ऐसे मौके पर मुझे झपकी लगी थी,
और कुछ सेकेंड के लिए सपने भी आए…
शायद खूबसूरत भी थे…
पता नहीं…
ज़्यादा देर वे रुके नहीं
और झपकी कभी नींद बन नहीं पाई…
रात की कच्ची नींद
शापित होती है—बार-बार टूटने के लिए…
टूटी हुई रातें सपनों का वियोग
सहने को मजबूर होती हैं…
लेकिन ये समय रात का नहीं था,
अक्सर दोपहर या शाम का रहा,
जब झपकी और सपने साथ आए…
माँ कहती थी,
ऐसे समय देखे गए सपने कभी सच नहीं होते…
न गाढ़ी नींद आई, न बहुत देर तक सपने रहे…
तुम भी ऐसे ही किसी वक्त पर
लगी झपकी की आँखों में
‘हू-तू-तू’ खेलते हुए आए सपने की तरह थे…
तुम्हें पलकों को छूकर भागना था…
और मुझे?
काजल लगी आँखों की चौहद्दी से
कपूर की तरह भस्म हुए सपनों की राख को
उँगलियों से मलते-मलते खुद को समझाना था-
“सुनो जानेमन…
ऐसा भी होता है।
ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं।
सपने और सनम—दोनों बेवफ़ा होते हैं…
इसलिए तो कहते हैं-
मोहब्बत में समझदार बनना गुनाह है…
क्योंकि अक्सर-
“न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम,
न इधर के रहे, न उधर के।”
उम्र यूँ भी गुज़ारी जाती है…
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धन्यवाद सर 🙏